सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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४६ ] ।। सुन्दर विलास ।।
मुख के झरोखे मै वचन न उचार होत, जीभ हू कौ खटरस स्वाद न विसेखिये । सुन्दर कहत कोउ कौन बिधि जानै ताहि, कारौ पीरौ काहू द्वार जानौ हू न पेखिये ॥७॥ माई तौ पुकारि छाती कूटि कूटि रोवत है, बाप हू कहत मेरौ नन्दन कहा गयौ । भाइया कहत मेरी बाह आज दूरि भई, बहन कहत मेरै बीर दुख है दयौ ॥ कामिनी कहत मेरौ सीस सिरताज कहा, उनि ततकाल हाथ मै सिधौरा है लयौ । सुन्दर कहत ताहि कोऊ नहि जानि सकै, बोलत हुतौ सु यह छिन मैं कहा भयौ ॥८॥ रज अरु बीरज कौ प्रथम सयोग भयौ, चेतना सकति तब कौन भाति आई है । कोऊ तौ कहत बीज मध्य ही कियौ प्रवेस, किनहु क पंच मास पीछै कै सुनाई है ॥ (८) सिधोरा-सिंदूर नारियल आदि सती होने का सामान । बोलत हुतो-बोलने वाला ।