भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 56

॥ देहात्म विछोह को अंग ॥ [ ४७ देह कौ बियोग जब देखत ही होइ गयौ. तब कोऊ कहै कहा जाइ कै समाई है । पण्डित रिषीश्वर तपीश्वर मुनीश्वर ऊ, सुन्दर कहत यह किनहू न पाई है ॥६॥ तबहि लौ क्रिया सब होत है विविध भांति, जब लग घट माहि चेतन प्रकास है । देह कै अशक्त भये क्रिया सब थकि जात, जब लग श्वास चलै तब लग आश है ॥ श्वासऊ थक्यौ है जब रोवन लगे है तब, सब कोऊ कहैं यह भयौ घट नास है । काहू नहिं देख्यौ किंहि और कौन कहा गयौ, सुन्दर कहत यह बडौई तमास है ॥१०॥ देह तौ सुरूप तौलौ जौलौ है अरूप माहि, सब कोऊ आदर करत सनमान है । टेढी पाग बाधि वार वार ही मरोरै मूछ, बाहु उसकारै अति धरत गुमान है ॥ (१०) असक्त-अशक्त, असमर्थ ।