सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ तृष्णा को अग ॥ [ ५१ भूख लिये दसहू दिस दौरत, ताहि तैं तूं कबहू न अघै है । भूख भण्डार भरै नहि कैसै हु, जो, धन मेरु कुबेर लौ पै है ॥ तू अब आगै ही हाथ पसारत, ताहि तै हाथ कछू नहिं ऐहै । सुन्दर क्यों नहिं तोष करै नर, खाइ हि खाइ केतौइक खैहै ॥५॥ भूख नचावत रक हि राज हि, भूख नचाइकै विश्व विगोई । भूख नचावत इन्द्र सुरासुर, और अनेक जहा लग जोई ॥ भूख नचावत है अध ऊरध, तीनहू लोक गनै कहा कोई । सुन्दर जाइ तहा दुख ही दुख, ज्ञान बिना न कहू सुख होई ॥६॥ (६) विगोई-विगाड देती है। अध-नीचे के लोक। ऊरध-ऊपर के लोक ।