भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

५२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पेट पसार दियौ जितही तित, तै यह भूख कितीयक थापी । ओर न छोर कछू नहि आवत, मैं बहु भाति भली बिधि मापी ॥ देखत देह भयौ सब जीरन, तू नित नौतन आहि अद्यापी । सुन्दर तोहि सदा समझावत, हे तृष्णा ! अजहू नही घापी ॥७॥ तीनहू लोक अहार कियौ फिर, सात समुद्र पियौ सब पानी । और जहा तहा ताकत डोलत, काढत आँखि डरावत प्रानी ॥ दात दिखावत जीभ हलावत, याहि तें मै यह डाइनि जानी । सुन्दर खात भये कितने दिन, हे तृष्णा ! अजहू न अघानी ॥८॥ (७) जीरन-जीर्ण, जर्जर । नौतन-नूतन, नया । अद्यापी-अभी भी ।