सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ तृष्णा को अंग ॥ [ ५३ पांव पताल परै गये नीकसि, सीस गयौ असमान अघेरौ । हाथ दसो दिसि कौं पसरै पुनि, पेट भरै न समुद्र सुमेरौ ॥ तीनहु लोक लिये मुख भीतरि, आंखिहु कान बधे चहु फेरौ । सुन्दर देह धर्यो अति दीरघ, हे तृष्णा ! कहुं छेह न तेरौ ॥६॥ बादि वृथा भटकै निस बासर, दूरि कियौ कबहूं नहि घोषा । तूं हथियारीन पापिनि कोठनि, साच कहू मति मानहि रोषा ॥ तोहि मिल्यौ तबतें भयौ बधन, तूं मरि है तबही होइ मोषा । सुन्दर और कहा कहिये तोहि, हे तृष्णा ! अब तौ करि तोषा ॥१०॥ (९) अघेरो-आगे । सुमेरौ-सुमेरु पर्वत । (१०) हति- यारिन-हत्यारी । मोषा-मोक्ष, मुक्ति, छुटकारा ।