भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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५४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ क्यों जग माहि फिरै भख मारत, स्वारथ कौन पर्यौ जिहि जोलै । ज्यौ हरिहाइ गऊ नहि मानत, दूध दुह्यौ कछु सो पुनि ढोलै ॥ तू अति चंचल हाथ न आवत, नीकसि जाइ नही मुख बोलै । सुन्दर तौहि कह्यो बेरि केतक, है तृष्णा ! अब तू मति डोलै ॥११॥ तैं कोऊ कान धरी नहि एकहु, बोलत बोलत पेट ही पाक्यो । हौ कोऊ बात बनाइ कहू जब, त तब पीसत ही सब फाक्यौ ॥ केतक द्यौस भये परमोघत, तैं अब आगै हि ' को रथ हाक्यौ । सुन्दर सीख गई सबही चलि, हे तृष्णा ' कहि के तोहि थाक्यौ ॥१२॥ (११) हरिहाई-हरा चारा खाने को उतावली । (१२) द्यौस-दिवस, दिन । परमोघत-समझाते-समझाते । पीसत ही-पीसते पीसते ही ।