सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अधीरज उराहने को अग ॥ [ ५७ मनहर छन्द किधौ पेट चूल्हा किधौ भाठी किधौं भार आइ, जोई कछु झौंकिये सु सब जरि जातु है । किधौं पेट थल किधौ वावी किधौ सागर है, जितौ जल परै तितौ सकल समातु है ॥ किधौ पेट दैत्य किधौ भूत प्रेत राक्षस है, खाउ खाउ करै कहू नैकु न अघांतु है । सुन्दर कहत प्रभु कौन पाप लायौ पेट, जबतै जनम भयौ तब ही को खातु है ॥३॥ बिग्रह तौ बिग्रह करत अति बार बार, तनु पुनि तनुक न कबहू अधायौ है । घट न भरत क्यौ ही घट्योई रहत नित, शरीर रिराइ मैं तौ कछुक न खायौ है ॥ देह देह कहत ही कहत जनम बीत्यौ, पिंड पिंड काजै निसि दिन ललचायौ है । पुदगल गिलत गिलत न तृपत होइ, सुन्दर कहत बपु कौन पाप लायौ है ॥४॥ (३) किधो-क्या अथवा बनाग । भाटी-भट्टी । (४) विग्रह-शरीर या झगडा । तनु-शरीर । तनुक- थोडा सा भी । रिगइ-रोता ही रहता है । पुदगल-शरीर ।