भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 72

॥ विश्वास को अंग ॥ [ ६३ नैकु न धीरज धारत है नर, आतुर होइ दसौ दिस धावै । ज्यौ पसु खेचि तुडावत बंधन, जौ लग नीर न आवै ही आवै ॥ जानत नाहि महामति मूरख, जा घर द्वार धनी पहुचावै । सुन्दर आपु कियौ घडि भाजन, सो भरि है मति सोच उपावै ॥३॥ भाजन आपु घड्यौ जिनि तौ, भरि है भरि है भरि है भरि हैं जू । गावत है तिनकें गुन कौ, ढरि है ढरि हैं ढरि है ढरि है जू ॥ सुन्दर दास सहाइ सही, करि है करि है करि है करि है जू । आदि हू अंत हू मध्य सदा, हरि है हरि है हरि हैं हरि है जू ॥४॥ काहे कौ दौरत है दशहू दिश, तू नर देखि कियौ हरि जू कौ । बैठि रहै दुरिकै मुख मूंदि, उघारिकै दात खवाइ है टूकौ ॥ (३) नीर-चारा । भाजन-शरीर रूपी वर्तन । धनी- स्वामी । (४) ढरि है-दया करेगे । दुरिके-दुबक कर ।