भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ गर्भ थकै प्रतिपाल करी जब, होइ रह्यौ तब तू जड मूकौ । सुन्दर क्यो बिललात फिरै अब, राखि हृदै बिसवास प्रभू कौ ॥५॥ जा दिनतै गर्भवास तज्यौ नर, आइ अहार लियौ तबही कौ । खात हि खात भये इतने दिन, जानत नाहि न भूछ कही कौ ॥ दौरत धावत पेट दिखावत, तू शठ कीट सदा अन ही कौ । सुन्दर क्यौ बिसवास न राखत, सो प्रभु विश्व भरै कबही कौ ॥६॥ खेचर भूचर जे जल के चर, देत अहार चराचर पोखै । वे हरि जू सब कौ प्रतिपालत, जो जिहि भाति तिसी बिधि तोखै ॥ तू अब क्यौ बिसवास न राखत, भूलत है कत धोखै ही धोखै । तोहि तहा पहुचाइ रहै प्रभु, सुन्दर बैठि रहै किन ओखै ॥७॥ (६) भूछ-मुख । (७) ओखै-गुप्त स्थान ।