सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ विश्वास को अंग ॥ [ ६५ मनहर छंद काहे कौं बघूरा भयौ फिरत अज्ञानी नर, तेरं तौ रिजक तेरै घर बैठे आइ है । भावै तू सुमेर जाहि भावै जाहि मारू देश, जितनैक भाग लिख्यौ तितनैक पाइ है । कूप माझ भरि भावै सागर कै तीर भरि, जितनोंक भाडौ, नीर तितनौ समाइ है । ताहि ते सतोष करि सुन्दर बेसास धरि, जिनतौ रच्यौ है घट सोई जू भराई है ॥८॥ काहे को करत नर उद्यम अनेक भाति, जीवन है थोरो तातै कल्पना निवारिये । साढे तीन हाथ देह छिनक मे छूटि जाय, ताके लिए ऊचे ऊचे मन्दिर सवारिये । माल हू मुलक भये तृपति न क्यो ही होय, आगे ही को पसरत इन्द्रिय क्यो न मारिये । सुन्दर कहत तोहि बावरे समझि देख, जितनीक सोर पाँव तितने पसारिये ॥६॥ काहे कौं फिरत नर दीन भयौ घर घर, देखियत तेरौ तौ अहार एक सेर है । जाको देह सागर मैं सुनी शत ज जन की, ताहू कौ तौ देत प्रभु यामैं नहि फेर है ॥