सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ ] ।। सुन्दर विलास ।। भूखौ कोऊ रहत न जानिये जगत माहि, कीरी अरु कुजर सबनि ही कौ देत है । सुन्दर कहत तूं बेसास क्यौ न राखै शठ, बार बार समुझाइ कह्यौ केती बेर है ॥१०॥ तेरे तौ अधीरज तू आगिली ही चित करे, आज तौ भर्यौ है पेट काल्हि कैसी होइ है । भूखौ ही पुकारै अरु दिन उठि खातौ जाइ, श्रुति ही अज्ञानी जाकी मति गई खोइ है ॥ ताकौं नहिं जानै शठ जाकौ नाम विश्वभर, जहा तहा प्रगट सबनि देत सोइ है । सुन्दर कहत तोहि वाकौ तौ भरौसौ नाहि, एक बिसवास बिन याही भांति रोइ है ॥११॥ देखि धौं सकल विश्व भरत भरनहार, चूंच कै समान चूनि सबही कौ देत है । कीट पशु पखि मच्छ कच्छ अजगर पुनि, उनकै न सौदा कोऊ न तौ कछु खेत है ॥ पेट ही कै काज रात दिवस भ्रमत शठ, मैं तौ जान्यौ नीकै करि तू तौ कोऊ प्रेत है । मानुष सरीर पाइ करत है हाइ हाइ, सुन्दर कहत नर तेरै सिर रेत है ॥१२॥ (१०) जोजन-योजन, चार कोस । शत-सौ ।