सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ देहमलिनता व गर्वप्रहार को अंग ॥८॥ मनहर छंद देह तौ मलीन अति बहुत विकार भरे, ताहू माहि जरा व्याधि सब दुख राशी है । कबहूक पेट पीर कबहूक सिर वाहि, कबहूक आंखि कान मुख मै विथासी है ॥ औरऊ अनेक रोग नख सिख पूरि रहे, कबहूं क श्वास चले कबहूक खासी है । ऐसौ या शरीर ताहि आपुनौ के मानत हैं, सुन्दर कहत यामैं कौन सुखवासी है ॥१॥ जा शरीर माहि तू अनेक सुख मानि रह्यौ, ताही तू बिचार यामैं कौन बात भली है । मेद मज्जा मास रस, रकत रगनि माहि, पेट हू पिटारी सी मैं ठौर ठौर मली है ॥ हाडनि सौं मुख भर्यौ हाड ही कै नैन नाक, हाथ पाव' सोऊ सब हाड ही की नली है । सुन्दर कहत याहि देखि जनि भूलै कोइ, भीतरि भगार भरि ऊपरि तैं कली है ॥२॥ (१) बिथा-व्यथा, पीडा, दर्द । (२) मली-मैला, मल- मूत्र आदि । भगार-रद्दी भद्दी चीजें । कली सुन्दर ।