भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

॥ देहमलिनता व गर्वप्रहार को अंग ॥ [ ६६ इन्दव छन्द हाड कौ पिंजर चाम मढ्‌यौ सब, माहि भर्‌यौ मल मूत्र बिकारा । थूक रु लार परै मुख ते पुनि, व्याधि बहै सब और हु द्वारा ॥ मांस को जीभ सों खाइ सबै कछु, ताहि ते ताकौ है कौन बिचारा । ऐसै शरीर मैं पैसि कै सुन्दर, कैसैक कीजिये शुच्य अचारा ॥३॥ थूक रु लार भर्‌यौ मुख दीसत, आंखि मैं गीड रु नाक मैं सेंढ़ौ । औरऊ द्वार मलीन रहै नित, हाड के मांस के भीतर भेदौ ॥ ऐसै शरीर मैं बास कियौ तब, एक से दीसत बामन ढेढौ । सुन्दर गर्व कहा इतने पर, काहेकौ तूं नर चालत टेढौ ॥४॥ (३) शुच्य- शुद्ध । (४) भेदौ-चर्बी, मज्जा । बामन-ब्राह्मण ।

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक) · पृष्ठ 78, कुल 284 में से · BharatKosha