सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ नारीनिंदा को अंग ॥ [ ७१ अथ नारीनिंदा को अंग ॥१॥ मनहर छन्द कामिनी कौ देह मानौ कहिये सघन बन, उहा कोऊ जाइ सु तौ भूलिकै परतु है । कुंजर है गति, कटि केहरि कौ भय जामैँ, बेनी काली नागनीऊ फन कौ धरतु है ॥ कुच हैं पहार जहा काम चोर रहै तहा, साधिकै कटाक्ष बान प्रान कौ हरतु है । सुन्दर कहत एक और डर अति तामैँ, राक्षस बदन खाऊ खाऊ ही करतु है ॥१॥ बिष ही की भूमि माहि बिष के अंकुर भये, नारी बिष बेलि बढी नख सिख देखिये । विष ही के जर मूल बिष ही के डार पात, बिष ही के फूल फल लागे जू बिसेखिये ॥ विष के तंतू पसारि उरझाये आंटौ मारि, सब नरबृक्ष पर लपटी ही लेखिये । सुन्दर कहत कोऊ सन्त तरु बचि गये, तिनके तौ कहु लता लागी नहिं पेखिये ॥२॥ (२) नरवृक्ष-पुरुष रूपी वृक्ष ।