सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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७४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ दृष्ट को अंग ॥१०॥ मनहर छंद अपनै न दोष देखैं परके औगुन पेखै, दुष्ट कौ सुभाव उठि निंदा ई करतु है । जैसे कोऊ महल सवारि राख्यो नीकै करि, कीरी तहा जाइ छिद्र ढूढत फिरतु है ॥ भोर ही तै साझ लग साझ ही तैं भोर लग, सुन्दर कहत दिन ऐसैं ही भरतु है । पाव के तरे की आगि सूझै नही मूरिख कौ, और सौ कहत सिर ऊपर बरतु है ॥१॥ इन्दव छंद घात अनेक रहैं उर अंतरि,- दुष्ट कहै मुख सौ अति मीठी । लोटत पोटत व्याघ्रही ज्यौ नित, ताकत है पुनि ताहि की पीठी ॥ ऊपर तै छिरकै जल आनि सु, हेठ लगावत जारि अगीठी । या महिं कूर कछू मति जानहु, सुन्दर आपुनि आखिनि दीठी ॥२॥ (२) घात-हानि करने का विचार । हेठ नीचे ।