भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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पृष्ठ 84

॥ दुष्ट को अंग ॥ [ ७५ आपुन काज सवारन कै हित, और की काज विगारत जाई । आपुनौ कारज होइ न होइ, बुरी करि और की डारत भाई ॥ आपुहुं खोवत और हु खोवत, खोड दोऊ घर देत बहाई । सुन्दर देखत ही वनि आवत, दुष्ट करे नहि कौन बुराई ॥३॥ ज्यौ नर पोषत है निज देह हि, अन्न विनाश करै तिहि वारा । ज्यों अहि और मनुष्य हि काटत, वाहि कछू नहि होइ अहारा ॥ ज्यों पुनि पावक जारि सबै कछु, आपुहु नाश भयौ निरधारा । त्यौ यह सुन्दर दुष्ट सुभाव हि, जानि तजौ किन तीन प्रकारा ॥४॥ (३) हेठ-नीचे । (४) अहारा-भोजन ।