सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ मन को अंग ॥ [ ८७ आगिले झरत पात नये नये होत जात, ऐसौ याही तरु कौ अनादि काल मूल है ॥ दश च्यारि लोक लौ पसरि जहा तहा रह्यो, अध पुनि ऊरध सूखिम अरु थूल है । कोऊ तौ कहत सत्य कोऊ तौ कहै असत्य, सुन्दर सकल मत ही कौ भ्रम भूल है ॥२३॥ तौ सो न कपूत कोऊ कतहूं न देखियत, तौ सो न सपूत कोऊ देखियत और है । तूं ही आप भूलि महा नीच हूं तें नीच होइ, तूं ही आपु जाते तें सकल शिरमोर है ॥ तू ही आपु भ्रमै तब भ्रमत जगत देखै, तेरे थिर भये सब ठौर ही कौ ठौर है । तूं ही जीव रूप तू ही ब्रह्म है अकाशवत, सुन्दर कहत मन तेरी सब दौर है ॥२४॥ मन ही कै भ्रम तै जगत यह देखियत, मन ही कौ भ्रम गयौ जगत विलात है । मन ही कै भ्रम जेवरी मैं उपजत साप, मन कै विचारै साप जेवरी समात है ॥ (२३) विटप-वृक्ष । दश-च्यार-चौदह ।