सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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८८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मन ही कै भ्रम तै मरीचिका कौ जल कहै, मन ही कै भ्रम सीपि रूपौ सो दिखात है । सुन्दर सकल यह दीसै मन ही कौ भ्रम, मन ही कौ भ्रम गये ब्रह्म होइ जात है ॥२५॥ मन ही जगत रूप होइ करि विसतर्यौ, मन ही अलख रूप जगत सौ न्यारौ है । मन ही सकल घट व्यापक अखंड एक, मन ही सकल यह जगत पियारौ है ॥ मन ही आकाशवत हाथ न परत कछु, मन के न रूप रेख बुद्ध ही न वारौ है । सुन्दर कहत परमारथ बिचारै जब, मन मिटि जाइ एक ब्रह्म निज सारौ है ॥२६॥ ॥ इति मन को अङ्ग सम्पूर्णं ॥ (२५) मरीचिका-मृगतृष्णा । रूपौ-चांदी ।