भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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॥ चांनक को अंग ॥ [ ८६ अथ चांनक को अंग ॥१२॥ मनहर छंद जोई जोई छूटिबे कौ करत उपाइ अज्ञ, सोई सोई दिढ करि बंधन परतु है । जोग जज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि और, झपापात लेत जाइ हिंमारै गरतु है ॥ कानऊ फराइ पुनि केसऊ लुचाई अग, बिभूति लगाइ सिर जटाऊ धरतु है । बिनु ज्ञान पाये नहि छूटत हृदै की ग्रन्थि, सुन्दर कहैत यौं ही भ्रमि कै मरतु है ॥१॥ निर्मांत्रिक छंद जप तप करत धरत ब्रत जत सत, मन बच क्रम भ्रम कष्ट सहत तन । वलकल बसन अशन फल पत्र जल, कसत रसन रस तजत बसत वन ॥ जरत मरत नर गरत परत सर, कहत लहत हय गय दल वल धन । पचत पचत भव भय न टरत शठ, घट घट प्रगट गृहत न लखत जन ॥२॥ (१) दिढ-दृढ, मजबूत । झपापात-पहाड की चट्टान से गिरना । हिमारै-हिमालय । ग्रन्थि-गाठ, घुण्डी । (२) वालकल-वल्कल, छाल । वसन-वस्त्र । अशन- भोजन । रसन-जीभ । हय-घोडे । गय-गज । कपट-कष्ट ।