भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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९४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् निजेन्द्रियेभ्योऽपि निगूह्यमानं गाहेत कोऽन्तःकरणं कुमार्याः । अनन्यजन्माऽयमनन्यवृत्तिरुपायतौ यन् मतिमानुपास्ते ॥२१॥ स्वयं अपनी ही इन्द्रियों से भी छिपाये हुए (भावों वाले) कुमारी के अन्तःकरण को कौन जान सकता है ? स्वयं आत्मभू बुद्धिमान् कामदेव, शरीर-रहित होने पर भी, अन्य सब कार्य छोड़ कर बड़े यत्नपूर्वक, कुमारी के अन्तःकरण में प्रवेश पाने के लिये, उपासना किया करता है ॥२१॥ कलाविलासेऽप्यलसं कृशाङ्ग्याः ससञ्ज नालञ्जनरञ्जनाय । क्रीडाविनोदेषु विनोदितायाः सखीसमाजे न ससज्ज चेतः ॥२२॥ कृशांगी कान्तिमती का चित्त, कलाविलास में भी आलस धारण करके, लोगों को प्रसन्न न कर सका और सखीसमाज में भी, क्रीडा और विनोद से सखियों द्वारा कान्तिमती को प्रसन्न करने का प्रयत्न करने पर भी, इसका चित्त प्रसन्न न हो सका ॥२२॥ दिने दिने दूनधियो नताङ्ग्याः प्रपद्यमानं परिपाण्डिमानम् । सुवर्णपङ्केरुहकान्तिवक्त्रं बभूव दुर्वर्णसरोजवर्णम् ॥२३॥ (विरह में) दुः‌खित मन वाली कृशांगी का दिन-दिन पीला पड़ने वाला मुख, जो पहले खिले हुए स्वर्ण-कमल के समान था, अब मुरझाये हुये पीले कमल के समान हो गया है ॥२३॥ प्रतिक्षणं क्षामतरीभवन्त्या भवत्कृते पाण्डरदीर्घमस्याः । चकर्ष कृष्णप्रतिपन्मृगाङ्कबिम्बस्य कान्तिं मुखमुत्पलाक्ष्याः ॥२४॥ आपके विरह में प्रतिक्षण दुबली होने वाली कमलनयनी कान्तिमती का पीला और लटका हुआ मुख, कृष्णपक्ष की प्रतिपदा के (दिन-दिन ह्रास होने वाले) चन्द्रबिम्ब के समान लग रहा है ॥२४॥ जानौ कफोणि शिथिले कपोलं कराम्बुजन्मन्थ नासिकायाम् । विधाय दृष्टिं त्वयि चित्तवृत्तिं निनाय दीना कतिचिद् दिनानि ॥२५॥ घुटने पर कुहनी, ढीले और दुर्बल कर-कमल पर गाल, नाक पर दृष्टि और आप में मन रख कर बिचारी कान्तिमती किसी तरह कुछ दिन निकाल रही है ॥२५॥ अथैकदा कन्दलितानुरागा यामे तुरीये किल यामवत्याः । स्वप्नान्तरे कञ्चन पञ्चबाणसमानकान्तिं सुमुखी ददर्श ॥२६॥ एक बार सुमुखी कान्तिमती ने, अनुराग बढ़ जाने के कारण, रात के तीसरे पहर में स्वप्न में कामदेव के समान सुन्दर किसी पुरुष को (आपको) देखा ॥२६॥ ततस्तदीयाननपूर्णचन्द्रविलोचनान् मानसमिन्दुमुख्याः । विमुक्तमर्यादमभूत् तरङ्गैर्गभीरमप्यम्बु यथाम्बुराशेः ॥२७॥ तब आपके मुखरूपी पूर्णचन्द्र के दर्शन करने से चन्द्रमुखी कान्तिमती का मानसरोवर के समान गंभीर मन, पूर्णचन्द्र के दर्शन करने से ज्वार आए हुए समुद्र के गंभीर जल के समान, बड़ी-बड़ी तरंगों से उद्वेलित होकर मर्यादा छोड़ बैठा ॥२७॥ (२१) अनन्यजन्मा कामः।