सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः ९३ सुवर्णशैलात् पृथिवीविभागं पयांसि पीयूषपयोधिमध्यात् । तेजः शरच्छीतमरीचिबिम्बाच्छ्रीखण्डशैलानिलतस्तदंशम् ॥१४॥ आकाशमाकृष्य पुनः स्वकीयतूणीररन्ध्रान् निजनैपुणेन । विनिर्ममे काचन सृष्टिरन्या मन्ये मनोजेन मनोहरा सा ॥१५॥ उस कान्तिमती को मानों कामदेव ने, स्वर्णमय सुमेरु पर्वत से पृथ्वी का भाग लेकर, अमृत- समुद्र से जल का भाग लेकर, शरद् ऋतु के पूर्ण चन्द्रबिम्ब से तेज का अंश लेकर, (चन्दनों से सुशोभित) मलयगिरि के पवन से वायु का अंश लेकर और अपने तरकस के भीतर से आकाश का अंश निकालकर इन अपूर्व पंच महाभूतों से, अपनी निपुणता को सिद्ध करने के लिए एक अद्वि- तीय सुन्दरी के रूप में रचा है ॥१४-१५॥ निर्माय तां मन्मथजैत्रसिद्धिमाकृष्टसारा विधिना पदार्थाः । ये न्यक्कृताः किन्नु त एव जाताः सुधासुधांशूत्पलपङ्कजाद्याः ॥१६॥ अथवा, स्वयं ब्रह्मा ने कामदेव की विजयसिद्धि के रूप में उसका निर्माण विविध पदार्थों का सार निकाल कर किया और जिन-जिन पदार्थों का सार निकाल कर उन्हें फेंक दिया शायद वे पदार्थ ही लोक में अमृत, चन्द्रमा, कुमुद, कमल इत्यादि नामों से प्रसिद्ध हुये !।१६॥ सुधामयः कोपि भवेत् पयोधिर्मथ्नाति तञ्चेत् स्वयमेव कामः । जायेत चेत् काचन तत्र लक्ष्मीः समानतामृच्छति सैव तस्याः ॥१७॥ यदि कोई अमृत का समुद्र हो और यदि स्वयं कामदेव उसका मन्थन करे और फिर उसमें से कोई लक्ष्मी प्रकट हो तो वह लक्ष्मी ही कान्तिमती की कुछ समानता कर सकती है ॥१७॥ एकैककर्मण्युचिते समर्थाः संमोहना ये मदनस्य बाणाः । इयन्तु तस्य स्फुटयत्यजस्रं कर्माद्भुतं मार्गणपञ्चकस्य ॥१८॥ कामदेव के पाँचों बाण अलग-अलग अपने एक-एक संमोहन कर्म में ही समर्थ हैं, किन्तु यह कान्तिमती तो कामदेव के पाँचों बाणों की एक साथ पाँचों संमोहन कर्मों में निपुण अद्भुत- शक्ति है ॥१८॥ अभ्याशमभ्यासवशाद् गतायाः पितुः कदाचित् तनुमध्यमायाः । कर्णान्तरस्या विविशुस्त्वदीया गुणोच्चयाश्चारणगीयमानाः ॥१९॥ अभ्यासवश एक दिन जब कान्तिमती अपने पिता के पास बैठी हुई थी तब चारणों द्वारा गाए गए आपके गुणसमूहों ने इसके कानों में प्रवेश किया ॥१९॥ सा वर्तमाना तरुणिम्नि नव्ये कामेव धत्तेऽङ्कुरितामवस्थाम् । येते निगूढान्यपि मानसानि निगूहितुं सन्ततमीहितानि ॥२०॥ कान्तिमती नई तरुणावस्था (नवयौवन) में स्थित होकर एक अद्वितीय (कामदेव द्वारा) अंकुरित अवस्था को धारण कर रही है। वह (लज्जावश) मन में छिपी हुई इच्छाओं को भी बार बार छिपाने का यत्न करती है ॥२०॥