भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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१२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् असूयताऽसौ सुतनुस्तनूजौ जयप्रभावाविव विक्रमार्द्धिः । नृपस्तयोः पूर्वजमाह पृथ्वीराजं स माणिक्यमथानुजातम् ॥ ७ ॥ जैसे पराक्रमशक्ति विजय और प्रभाव को उत्पन्न करती है वैसे ही सुन्दरी कर्पूरदेवी ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिनमें बड़े का नाम, राजा सोमेश्वर ने, पृथ्वीराज और छोटे का नाम माणिक्यराज रक्खा ॥ ७ ॥ गुणैर्महाघ्यैर्महसा यशोभिरन्योन्यसाधर्म्यमुभौ दधानौ । सौभ्रात्रसम्पादितशुद्धचित्तावैवयं दधाते स्म यथाश्विनेयौ ॥ ८ ॥ पृथ्वीराज और माणिक्यराज दोनों भाई बहुमूल्य गुणों में, तेज में और यश में एक दूसरे के समान थे और दोनों, भ्रातृप्रेम से विशुद्ध अन्तःकरण वाले होने के कारण, अश्विनीकुमारों की भाँति, एक से लगते थे ॥ ८ ॥ विभज्य राज्यं भुजवीर्यभाजौ पित्रा प्रणीतं प्रतिपालयन्तौ । निशाकरार्काविव न स्वकीयमतीयुतुस्तौ समयं कथञ्चित् ॥ ९ ॥ श्रेष्ठ बाहुबल वाले उन दोनों भाइयों ने पिता के दिये हुए राज्य को आपस में बाँट कर शासन किया और सूर्य तथा चन्द्र के समान कभी एक दूसरे के समय का उल्लंघन नहीं किया ॥ ९ ॥ पित्रार्पितायामवितृप्तचेताः सम्प्रद्य प्राप्तगुणप्रकर्षः । ज्यायांस्तयोः सन्ततमात्मतेजःसमृद्धिसाध्यां विभुतामियेष ॥१०॥ बड़े भाई पृथ्वीराज ने, अपने गुणप्रकर्ष के कारण, पिता के दिये हुए साम्राज्य से सन्तुष्ट न होकर, अपने स्वयं के पराक्रम से अधिक साम्राज्य प्राप्त किया ॥१०॥ पुरो बहिः क्वापि विहारभूमौ वसन्तमेनं प्रतिहारपत्नी । समागतां काञ्चन कान्यकुब्जात् प्रावेदयत् पार्श्वचरीं प्रगल्भाम् ॥११॥ एक दिन जब पृथ्वीराज अपने नगर के बाहर उद्यानभूमि में विहार कर रहे थे तब प्रतिहारी ने निवेदन किया कि कान्यकुब्ज (कन्नौज) देश से आई हुई एक चतुर महिला मिलना चाहती है ॥११॥ तदिङ्गितेनाधिगतप्रवेशा विधाय शश्वन् नृपतौ प्रणामम् । पृष्टा समाचष्ट समाहिताऽसौ हितार्थिनी भर्तुरथात्मजायाः ॥१२॥ राजा के संकेत से अनुमति पाकर प्रतिहारी ने उस महिला को भीतर प्रविष्ट किया । उसने राजा को प्रणाम करके, पूछे जाने पर, सावधानी से, अपने स्वामी की पुत्री के हित के लिये इस प्रकार निवेदन किया ॥१२॥ यमश्ववारा नवलक्षसङ्ख्याः सङ्ख्यास्वसङ्ख्येयगुणं भजन्ते । कन्या ततोऽजायत कान्यकुब्जक्षितीश्वरात् कान्तिमतीति नाम्ना ॥१३॥ जिनकी संख्या की कोई गणना नहीं ऐसे गुणों से युक्त और नौ लाख घुड़सवारों की सेना के स्वामी कान्यकुब्ज देश के राजा की कान्तिमती नामक कन्या है ॥१३॥