सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सर्वेन्द्रियाणि प्रतिपत्तिशून्यान्यस्या दधत्याः सततं वयस्याः । विलोचनोन्मीलनमीलनाभ्यां प्रबोधमूर्च्छे परमुन्नयन्ति ॥३५॥ कान्तिमती की सब इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों को ग्रहण करने में निश्चेष्ट हैं। इसकी सखियाँ केवल इसके नेत्रों के खुलने और बन्द होने से जागरण और मूर्च्छा का अनुमान लगाती हैं ॥३५॥ अवाप्तदाहस्तनुते स्म दाहं मूर्च्छाङ्गतोऽसौ व्यतरच्च मूर्च्छाम् । मन्ये मनोभूरतनूत्वमस्यै निजं पदं दित्सति सेव्यमानः ॥३६॥ इसकी सेवा से प्रसन्न होकर कामदेव अपनी वस्तुएँ इसे दे रहा ह—कामदेव को शिवजी के तृतीय नेत्र से दाह मिला था, अतः वह कान्तिमती को (पूर्वराग) दाह दे रहा है। उसे (दाह के बाद) मूर्च्छा मिली थी, अतः वह इसे भी मूर्च्छा दे रहा है। कामदेव स्वयं शरीर-रहित है, अतः अत्यन्त प्रसन्न होकर अब वह कान्तिमती को भी अपने समान ही शरीर-रहित बनाना चाहता है ॥३६॥ अत्रान्तरेऽरुन्तुदमन्यदेव दैवेन वैमुख्यभृतोपनीतम् । जामातरं प्रार्थयते प्रतीपो राजन्यमन्यं जनको यदस्याः ॥३७॥ इसी बीच में विमुख विधाता ने एक मर्म-स्पर्शी घटना खड़ी कर दी है। वह यह कि कान्ति- मती के पिता, इसके शत्रु बनकर, एक दूसरे राजा को अपना जामाता बनाना चाहते हैं ॥३७॥ अथातिरेकस्रवदस्त्रवर्षैराप्लावयन्ती वपुरुष्णमुष्णैः । प्रत्येकमाभाष्य सखीः कथञ्चिच्छनैर्बभाषे करुणं कुमारी ॥३८॥ तब दुःख के आवेग से बहनेवाले गरम आँसुओं की वृष्टि से अपने गरम शरीर को सींचती हुई कान्तिमती प्रत्येक सखी को निर्दिष्ट कर किसी प्रकार धीरे-धीरे करुणस्वर से बोली ॥३८॥ अहो महामोहजविभ्रमोऽयं व्योमस्थितेन्दोः परिशीलनाय । रसातलावस्थितपञ्जरान्तःस्थिता चकोरी कुरुते यदाशाम् ॥३९॥ अहो ! पृथ्वी पर स्थित पिंजरे में बन्द चकोरी की आकाश में स्थित चन्द्रमा को प्राप्त करने की आशा कितने बड़े अज्ञान से उत्पन्न मूर्खता की बात है ! ॥३९॥ असंस्तुते पुंसि नराधिनाथे हासाय सन्देशवचो वधूनाम् । तत्रापि पाणिग्रहणाय कन्यावचोविकाशोऽपि विडम्बनाय ॥४०॥ बिना जान-पहचान के पुरुष के लिये, और विशेष कर राजा के लिये, किसी कुमारी का प्रणय- सन्देश वचन हास्यास्पद है। फिर कन्या का अपनी ओर से विवाह का प्रस्ताव तो और भी विड- म्बनापूर्ण है ॥४०॥ अतीव दुष्प्राप्यमनोरथेऽस्मिन्नाशा ङ्कुरस्यापि न मेऽवकाशः । अतः परं पञ्चशरस्य पञ्चसहस्रसङ्ख्या विशिखाः पतन्तु ॥४१॥ मेरे अत्यन्त दुष्प्राप्य इस मनोरथ में आशा के अंकुर उगने का कोई अवकाश नहीं है। अतः अब भले ही कामदेव के पाँच क्या पाँच हज़ार बाण भी मुझ पर पड़ें तो भी कोई चिन्ता नहीं ॥४१॥