सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३ दशमः सर्गः ९७ इति ब्रुवाणां वरवर्णनों तां हृदा विनिर्णोय सखी जगाद । त्वय्येव तावद् विशिनष्टि शोभां मनोऽनुरूपो हि मनोरथस्ते ॥४२॥ इस प्रकार कहने वाली सुन्दरी कान्तिमती से सखी ने, मन में विचार कर, कहा कि तुम्हारे मन के अनुकूल यह मनोरथ तुम्हीं को शोभा देता है ॥४२॥ लावण्यतारुण्यगुणाभिजात्यैरनूनता ते नियतं नताङ्गि । जागर्ति योग्यद्वययोजनायां विधे विदग्धाभिमता च वृत्तिः ॥४३॥ नतांगि ! तुम्हारे सौन्दर्य, यौवन, गुण, और कुल आदि में कोई कमी नहीं है और विधाता की चातुर्य से शोभित मनोवृत्ति दो योग्य युवक-युवती को मिलाने में प्रसिद्ध है ही ॥४३॥ तद् धैर्यवृत्त्या विनिरुध्य बाधां कालं कियन्तं प्रतिपालय त्वम् । यावद् विदध्यामहमात्मबुध्या कमप्युपायं कमलायताक्षि ॥४४॥ कमल-नयनि ! कुछ समय तक व्यथा को रोक कर धैर्य धारण करो, तब तक अपनी बुद्धि के अनुसार मैं भी कुछ न कुछ उपाय निकाल लूंगी ॥४४॥ इत्थं समाश्वास्य सखीं सखेदं समीक्ष्य मां साश्रुमुखी जगाद । शाकम्भरीं प्राप्य पुरं समस्तं पृथ्वीपतेस्तस्य निवेदयेति ॥४५॥ अपनी सखी कान्तिमती को इस प्रकार आश्वासन देने पर, मुझे खिन्न देख कर, रोते हुये उसने मुझसे कहा कि शाकंभरी नगरी जाकर पृथ्वीराज के समक्ष सारा हाल निवेदन करो ॥४५॥ ॰ तदेतदावेदितमग्रतस्ते यथानुभूतं ननु भूपतीश । व्रजाम्यहं शाधि मम क्षमस्व वैयात्यमेतत् परतन्त्रवृत्तेः ॥४६॥ राजन् ! मैंने आपके आगे सारा हाल निवेदन कर दिया है। अब मैं जाती हूँ, मुझे आज्ञा दें, और परतन्त्र होने के कारण जो कुछ मुझसे यह धृष्टता हुई उसे क्षमा करें ॥४६॥ एवं निवेद्याऽऽनतकन्धरा सा धराभृता भूमिभुजो भुजिष्या । प्रमोदमञ्जुस्मितकौमुदीभिर्मुखेन्दुमुद्भासयता बभाषे ॥४७॥ इस प्रकार निवेदन करके नतमस्तक खड़ी हुई कान्यकुब्जेश्वर की परिचारिका से राजा पृथ्वीराज ने, हर्ष स मनोहर मुसकान रूपी चाँदनी से अपने मुख-चन्द्र को प्रकाशित करते हुये, यह कहा ॥४७॥ संसारकासारसरोरुहिण्यास्तस्याः स्मरस्याप्यधिदेवतायाः । पीयूषधारामधुरा गुणौघा मया मुहुः श्रोत्रपुटेन पीताः ॥४८॥ संसार-रूपी सरोवर की सरोजिनी और कामदेव की भी स्वामिनी उस कान्तिमती के अमृत की धारा के समान मधुर गुण-समूहों को मैंने बार बार अपने कानों-रूपी दोनों से पिया है ॥४८॥ जानीहि पाणिस्थितमेव तावन् महत् मनोराज्यफलं मृगाक्ष्याः । एवं यदि त्वत्कथनानुरूपस्तस्यामपि स्यादनुरागबन्धः ॥४९॥ उस मृग-नयनी के महान् मनोरथ के फल को हथेली पर रखा हुआ ही समझो, यदि, जैसा तुम कह रही हो, उसके हृदय में भी मेरे प्रति इतना अनुराग है ॥४९॥