सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 124, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंगच्छ संवर्धय सावधाना कल्याणि कान्तां मम वाचिकेन । इतीरयित्वा त्वरितं कृतज्ञः कृतप्रसादो विससर्ज दूतीम् ॥५२॥
Wait, look at line 10: "तद् गच्छ" or "तद्गच्छ"? There is a space: "तद् गच्छ".
Let's check line 4: "में शीघ्र ही कोई न कोई उपाय ढूंढ कर..." Wait, "में" or "मैं"? Look at the first word: "मैं" or "में"? It has two matras: "मैं"! Let's look at the first character: "मैं शीघ्र ही..." -> Yes, "मैं"!
Let's check line 4: "ढूंढ" or "ढूँढ"? It has a candrabindu: "ढूँढ".
Let's check line 4: "मादकनयनी के सन्ताप को दूर करूँगा ।" Wait, "को" has a dot? "क़ो"? No, just "को".
Let's check line 12: "कल्याणि ! अब तुम जाओ और सावधानी के साथ मेरे वचनों से प्रिया को सन्तुष्ट करो ।"
Line 13: "कुशल पृथ्वीराज ने यह कहकर और अपने सत्कार से दूती को प्रसन्न करके रवाना किया ॥५२॥"
Line 16: "बन्धु-वर्ग