भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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पुरं समन्तादकुतोभयोऽसौ कुतूहलीकृत्य विनिर्णयाय । बभ्राम तद्गोपुरतोरणाट्टशृङ्गारकाक्रीडकृतोपशोभाम् ॥५८॥ कुतूहलवश सब कुछ अच्छी तरह देख लेने के लिये वे पृथ्वीराज, नगर के दरवाजे, महलों के बाहरी फाटक, बड़े-बड़े महल, चौराहे और उद्यान आदि से शोभित कान्यकुब्ज नगरी में घूमते रहते थे ॥५८॥ स रोधसा सञ्चरते स्म नित्यं सुरापगायास्तुरगद्वितीयः । वीचीपरीरम्भणमेदुरेण संवोज्यमानो वनमारुतेन ॥५९॥ वे अकेले ही घोड़े पर सवार होकर प्रतिदिन गंगा के तट पर चक्कर लगाया करते थे और गंगा की लहरों के आलिंगन से गीला, वन का पवन उनका श्रम दूर किया करता था ॥५९॥ कुमुद्वतीकामुककान्तिपूरैर्धौतान्धकारासु निशीथिनीषु । कदाचिदस्याः पुलिनं जगाम तुरङ्गमं पाययितुं पयांसि ॥६०॥ उन रातों में जिनका अन्धकार कुमुदिनी के प्रिय चन्द्रमा की चाँदनी की धाराओं से धो दिया गया था, एक बार पृथ्वीराज अपने घोड़े को गंगातट पर जल पिलाने गये ॥६०॥ निमग्नवक्त्रं पिबतो हयस्य चलाचलस्फोणितफेनगन्धात् । आपेतुरत्याकुलमुत्पलाक्षीचक्षुर्वलोलाः सहसा शफर्यः ॥६१॥ जब घोड़ा नीची गर्दन करके जल पी रहा था तो उसके मुँह चलाने और फू-फू करने से जो झाग निकले उनकी गन्ध से आकृष्ट होकर कमल-नयनी सुन्दरियों के नेत्रों के समान चंचल मछलियाँ सहसा दौड़-दौड़ कर आने लगीं ॥६१॥ विलोक्य ताः कौतुकमग्नचेताश्चिक्षेप मुक्ताः क्षितिपः स्वकण्ठात् । लाजांशया तत्र जलाशयान्तःस्थिताः समुत्पेतुरनेकशतः ॥६२॥ उनको देख कर कुतूहल में मग्न चित्त वाले पृथ्वीराज ने अपने कंठ से मोतियों का हार निकाल कर उसके मोती थोड़े-थोड़े करके जल में फेंकना शुरु किया और जल के अन्दर स्थित वे मछलियाँ भी उन मोतियों को लावा समझ कर एक के ऊपर एक टूट पड़ीं ॥६२॥ क्रीडन्तमेवं तुरगद्वितीयं विलोकयामास विशालसत्वम् । तं कान्यकुब्जेश्वरकन्यका सा प्रसादवातायनगा सखीभिः ॥६३॥ घोड़े के उस पराक्रमी साथी को इस प्रकार खेल करते हुए, महल की खिड़की से, सखियों के साथ कान्यकुब्जेश्वर की कन्या ने देखा ॥६३॥ रूपेण गम्भीरमनोरमेण लोकोत्तरेणापि विचेष्टितेन । पर्याकुला विस्मयकौतुकाभ्यां स्वैरं बभाषे क्षितिपात्मजा सा ॥६४॥ उसके गंभीर और सुन्दर रूप को तथा लोकोत्तर क्रीड़ा को देखकर कान्तिमती विस्मय और कुतूहल से भर गईं और स्वच्छन्द होकर बोली ॥६४॥