भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१०० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् कोऽयं कलानाथ इवामृतानि किरन् दृशोः कन्दलयन्ननङ्गम् । एकोऽप्यनेकावृतवत् प्रभावाद् व्यपेतशङ्को विजरीहरीति ॥६५॥ चन्द्रमा के समान अमृत की वर्षा करने वाले, नेत्रों में कामदेव को जगाने वाले, अकेले होते हुए भी अपने प्रभाव के कारण अनेकों से घिरे हुए से लगने वाले, ये कौन हैं जो इस प्रकार निःशंक होकर विहार कर रहे हैं ? ॥६५॥ लाजानिवाऽऽजानुभुजोऽनुवेलं क्षिपत्यसौ पाथसि मौक्तिकानि । सत्त्वेन रूपेण जनातिगेन मन्ये भुवः कोपि भवेदधीशः ॥६६॥ ये आजानुबाहु हैं और लगातार जल में लावे जैसे मोती फेंक रहे हैं। इनके अलौकिक बल और रूप से पता चलता है कि कोई पृथिवीपति हैं ॥६६॥ निमज्जयन्ती हृदयं मृगाक्ष्याः सुधाम्बुराशौ मधुरैर्वचोभिः । जगाद तां बुद्धिमती भुजिष्या शाकम्भरीं या नगरीं गतासीत् ॥६७॥ अपने मधुर वचनों से मृगनयनी कान्तिमती का हृदय अमृत के समुद्र में डुबाती हुई वह बुद्धिमती परिचारिका, जो पहले शाकंभरी नगरी गई थी, यों बोलीं ॥६७॥ असंशयं सोऽयमशीर्णसत्वः सोमेश्वरस्य प्रथमस्तनूजः । आकारतो वा गुणवैभवाद् वा कस्तेन तुल्यो जगति द्वितीयः ॥६८॥ निःसन्देह ये सोमेश्वर के महाप्रतापी बड़े पुत्र हैं। रूप और गुण में इनके बराबर संसार में और कौन है ? ॥६८॥ प्रत्येषि नो चेन् मम शंसितेन कृशाङ्गि सन्देहविनोदनाय । अस्यान्तिकं प्रेषय कान्तिराशेः काञ्चित् तदा प्रत्ययितां भुजिष्याम् ॥६९॥ कृशांगि ! यदि आपको मेरे कथन में विश्वास नहीं हो तो अपने सन्देह के निवारण के लिये आप इन कान्तिपुञ्ज के पास किसी विश्वस्त परिचारिका को भेज कर देख लीजिए ॥६९॥ स्वभाव एवायमधीश्वराणां छायाद्वितीया अपि कौतुकेन । परीतमात्मानमुदारभृत्यवर्गैरिवार्यत्तधियो विदन्ति ॥७०॥ राजाओं का यह स्वभाव है कि अकेले होने पर भी कौतुकवश वे अपने आपको उदार अनु- चरों के समूहों से घिरे हुए समझते हैं ॥७०॥ समापिते सम्प्रति हाररत्ने जिघृक्षुरन्यान्यपि मौक्तिकानि । पश्चात्स्थितं कञ्चन मन्यमानः प्रसारयिष्यत्ययमग्रपाणिम् ॥७१॥ अभी जब यह हार समाप्त हो जायगा तो और मोतियों की इच्छा से ये, अपने पीछे किसी अनुचर को खड़ा हुआ समझकर, अपना हाथ बढ़ा देंगे ॥७१॥ प्रियां निशम्येति गिरं तदीयां कुतूहलेनाकुलिता कुमारी । समर्प्य मुक्ताफलजालकानि जवेन काञ्चित् प्रजिघाय दूतीम् ॥७२॥ उसके ये प्रिय वचन सुन कर कुमारी ने कुतूहलवश एक दूती को मोतियों के समूह देकर जल्दी से भेजा ॥७२॥