सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः १०१ आदेशतोऽस्याः सविधं जगाम दूती मनोवृत्तिरिव द्वितीया। मीनावलीरिङ्गणलोलदृष्टेर्मीनाङ्कमानं हरतो नृपस्य ॥७३॥ कुमारी की दूसरी मनोवृत्ति के समान वह दूती, आज्ञा पाकर, पृथ्वीराज के समीप गई जो चंचल नेत्रों से मछलियों का तैरना देख रहे थे और अपने सौन्दर्य से कामदेव का अभिमान दूर कर रहे थे ॥७३॥ अधृष्यरूपस्य धराभृतोऽस्य भीताप्यसौ साहसबद्धधैर्या । समीपमासाद्य शनैर्नयज्ञा छायेव पश्चादवतिष्ठते स्म ॥७४॥ राजा के प्रतापी रूप को देखकर वह भयभीत हो गई, किन्तु साहस करके धैर्य धारण किया और नीतिकुशल होने के कारण धीरे से पास जाकर छाया के समान पीछे खड़ी हो गई ॥७४॥ कौतूहलक्षिप्तहृदा नृपेण क्षिप्ते समस्ते सरिति स्वहारे। प्रसारिते पाणितलेऽस्य पश्चादुपानयन् मौक्तिकजालकं सा ॥७५॥ कुतूहलवश राजा ने अपना सारा हार गंगा में फेंक देने पर पीछे हाथ बढ़ाया और परिचा- रिका ने मोती का जाल उस पर रख दिया ॥७५॥ क्रमेण मीनास्यमुपागतासु मुक्तासु तास्वप्रथितासु तन्वी। आच्छिद्य सद्यो निजकण्ठदेशादकुण्ठसत्वा विततार हारम् ॥७६॥ उन खुले हुए मोतियों के धीरे-धीरे मछलियों के मुंह में पहुँच जाने पर, परिचारिका ने झट उत्साहपूर्वक अपने गले से हार उतार कर राजा के हाथ में धर दिया ॥७६॥ ॰ अथाङ्गनाकण्ठविभूषणं तद् विलोक्य विस्मेरमना मनीषी। विवर्त्य वक्त्रं विततप्रभावो विलोकयंस्तामबलां बभाषे ॥७७॥ बुद्धिमान् और विख्यात प्रभाव वाले राजा ने उस स्त्री के कंठ के हार को देखकर आश्चर्य- चकित होकर मुँह पीछे फेरा और उस अवला की ओर देखते हुए बोले ॥७७॥ का त्वं कुतस्त्यासि निशाचरीव घने निशीथे विजने भ्रमन्ती। त्वया किमर्थं व्ययितानि तावन् महार्घमुक्ताफलजालकानि ॥७८॥ तुम कौन हो ? कहाँ की हो ? इस घनी आधी रात में राक्षसी की तरह जंगल में क्यों घूम रही हो ? और अपने बहुमूल्य मोतियों के समूह तुमने किसलिये खर्च कर दिए ? ॥७८॥ तथा प्रगल्भाऽपि नृपप्रभावात् सा साध्वसोत्कम्पितचित्तवृत्तिः। प्रणम्य सङ्कोचितगात्रयष्टिः सगद्गदं प्रत्यवदत् कथञ्चित् ॥७९॥ यह सुन कर उस प्रौढ परिचारिका की चित्तवृत्ति, राजा के प्रभाव के कारण, भय से कम्पित हो उठी। राजा को प्रणाम करके, अपने पतले शरीर को सिकोड़ती हुई गद्गद कण्ठ से किसी प्रकार यों बोली ॥७९॥ अहं महाभाग ! महीश्वरस्य कुमारिकायाः परिचारिकाऽस्मि । प्रमाणयन्ती नियमेन तस्या निदेशमस्यां निशि बंभ्रमीमि ॥८०॥ महाभाग ! मैं कान्यकुब्जेश्वर की राजकुमारी की परिचारिका हूँ और नियमपूर्वक उन कुमारी की आज्ञा का पालन करने के कारण इस रात्रि में भी यहाँ आई हूँ ॥८०॥