भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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पृष्ठ 128

१०२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् मया पराधीनतया विमुक्ता स्वाभाविकी भीतिरपि त्रपापि । प्रभोर्निदेशस्य नितान्तवश्या गुणागुणं नैव विचारयन्ति ॥८१॥ पराधीन होने के कारण मैंने स्वाभाविक (स्त्री-सुलभ) भय और लज्जा दोनों छोड़ दिये हैं। स्वामी की आज्ञा के अत्यन्त परवश अनुचरगण गुण और दोष का विचार नहीं करते ॥८१॥ एकं भवन्तं विहरन्तमत्र स्वतन्त्रमत्यन्तमगाधसत्त्वम् । अन्तःपुरस्थ्या ददृशुः कृशाङ्ग्यो वातायनालम्बिदृगम्बुजान्ताः ॥८२॥ अत्यन्त पराक्रमी आपको यहाँ अकेले ही स्वतन्त्र-रूप से विहार करते हुये, अन्तःपुर की स्त्रियों ने, खिड़की की जालियों में अपने नयन-कमल झुका कर देखा ॥८२॥ आरूढसौधोच्छ्रितचन्द्रशाला बाला च सा त्वामवलोकयन्ती । अपृच्छदच्छाशयमायताक्षी पुनः पुनः पार्श्वचरीसमाजम् ॥८३॥ महल की ऊँची चन्द्रशाला पर चढ़कर राजकुमारी ने शुद्ध हृदय वाले आपको देखा और विस्मय से आँखें चौड़ी करके बार बार अनुचरियों के समाज से यों पूछा ॥८३॥ सख्यः समक्षीक्रियते पुरस्तात् कोऽयं विलासायुधवद् विलासी । धरावतीर्णः किमु रोहिणीशो हिनस्ति धैर्यस्थितिमिङ्गनानाम् ॥८४॥ सखियों ! कामदेव के समान विलासी ये कौन सामने दिखाई दे रहे हैं? क्या स्वयं चन्द्रमा धरती पर उतर कर रमणियों के धैर्य को दूर कर रहे हैं? ॥८४॥ निशम्य तद् बुद्धिमती भुजिष्या शाकम्भरीं या नगरीं गतासीत् । आचष्ट सा स्पष्टमयं स पृथ्वीराजो मया तत्र हि दृष्टपूर्वः ॥८५॥ यह सुनकर वह बुद्धिमती परिचारिका, जो पहले शाकंभरी नगरी गई थी, स्पष्ट बोली कि ये तो राजा पृथ्वीराज हैं जिनको मैंने पहले शाकंभरी में देखा था ॥८५॥ अन्या जगाद ग्रहिला स्वपक्षे साक्षेपमस्या विनिगृह्य वाचम् । असावसम्भावितभाषितेन येते मनस्तोषयितुं भवत्याः ॥८६॥ तब दूसरी सखी अपने पक्ष में आग्रह रखती हुई, आक्षेपपूर्वक पहली परिचारिका का खंडन करती हुई कहने लगी कि यह तो असंभव बात बना कर आपके मन को बहलाने का यत्न कर रही है ॥८६॥ यत्प्रस्थितौ वारणवाजिपत्तिभरेण दोलायितमेति भूमिः । एकाकिनोऽस्य भ्रमणं निशायां प्रत्येतु कोऽस्मिन् परराष्ट्रचक्रे ॥८७॥ जिन पृथ्वीराज के प्रस्थान के समय हाथियों, घोड़ों और पदातियों के भार से भूमि काँप उठती है, वे यहाँ दूसरे राज्य में रात के समय अकेले घूमेंगे-यह कौन मान सकता है ? ॥८७॥ भवन्ति तुल्याकृतयोप्यनेके लोकेऽत्र का विप्रतिपत्तिशङ्का । कल्याणि तुल्यासि यथा रतेस्त्वं मुखेन तुल्यश्च यथा तवेन्दुः ॥८८॥ इस संसार में बहुत से लोग हैं जिनकी आकृति आपस में मिलती है। इसमें कौन-सी विरोध वाली बात या शंका हो सकती है ? कल्याणि ! जैसे आप स्वयं रति के समान हैं या जैसे चन्द्रमा आपके मुख के समान है ॥८८॥