भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 130

१०४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इत्युक्तवान् मुक्तसरित्प्रतीरः प्रत्यागमत् स्वं शिविरं स वीरः । सापि प्रविष्टा सुमनाः पुरान्तः प्रमोदयामास मनः कुमार्याः ॥९६॥ यह कहकर वीर पृथ्वीराज गंगा के तट को छोड़कर अपने शिविर में चले गए और वह परि- चारिका भी प्रसन्न मन से अन्तःपुर में प्रवेश करके राजकुमारी के हृदय को प्रमोद देने लगी ॥९६॥ आकर्ण्य सन्देशहरोपनीतं सन्देहहारि प्रियभाषितं तत् । आसन्नसङ्गं तमुदीक्षमाणा क्षणं मृगाक्षी युगवद् विवेद ॥९७॥ संदेश लानेवाली परिचारिका के संदेह को हरनेवाले उन प्रियतम के प्रिय वचनों को सुन कर और प्रियतम का संग समीप जानकर मृगनयनी राजकुमारी के लिये एक क्षण भी युग के समान बीतने लगा ॥९७॥ अन्येद्युरुन्निद्रकुमुद्वतीके काले कलाविद् विहिताभ्युपायः । अलक्ष्यमाणः प्रतिहारपालैः पुरं कुमार्याः प्रमना विवेश ॥९८॥ दूसरे दिन रात में जब कुमुदिनी खिल रही थी, कला-निपुण