सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ दशमः सर्गः १०५ अयोजयत् तन् मिथुनं मनोज्ञं योग्यद्वयीयोजनविद् विधाता । प्राज्योदितस्नेहसमृद्धमन्तर्मनोभवाग्निं विनिधाय साक्ष्ये ॥१०३॥ योग्य वर-वधू को मिलाने में दक्ष विधाता ने, अत्यन्त उत्कृष्ट स्नेह से परिवर्धित, हृदय में स्थित, कामदेव रूपी अग्नि को साक्षी करके उस मनोहर वर-वधू के मिथुन को मिला दिया ॥१०३॥ मनोऽनुवृत्तिं मदनस्य तन्वन् प्रमाणयन् प्रेम नवं प्रियायाः । स विस्मृतान्यव्यसनप्रसङ्गो निनाय कान्तः कतिचित् त्रियामाः ॥१०४॥ कामदेव के मनोऽनुकूल व्यवहार करनेवाले और प्रिया के नवीन प्रेम को प्रमाणित करने वाले प्रिय पृथ्वीराज ने अन्य सब कुछ भूल कर कुछ रातें वहीं बिता दीं ॥१०४॥ वधूस्वभावान् नमितं मुखाब्जं समुन्नमय्य प्रणयात् प्रियायाः । प्रयातुकमः शिविरं स विज्ञः शनैरथाभाषत नीरजाक्षीम् ॥१०५॥ अपने शिविर में जाने की इच्छा रखनेवाले बुद्धिमान् राजा ने कमल-नयनी प्रिया के, नवोढ़ा के स्वभाव के कारण लज्जावश झुकाए गए मुख-कमल को प्रेमपूर्वक उठाकर, धीरे-धीरे उससे ये वचन कहे ॥१०५॥ न मां समायातमिहायताक्षि ! कश्चिद् विजानाति जनो मदीयः । अतो ममादर्शनजातखेदः कर्ता कुतर्काननुजीविलोकः ॥१०६॥ विशालनेत्रे ! मेरे अनुचरों में से कोई यह नहीं जानता कि मैं यहाँ आया हुआ हूँ। अतः मुझे न देखने के कारण दुखी हुए वे लोग नाना प्रकार के कुतर्क कर रहे होंगे ॥१०६॥ ऽमया विनाऽसौ विषयं विषादी नूनं व्रजेद् वीरजनो मदीयः । अनन्तरैरन्तरमेत्य भूपैस्ततो विलुप्येत बलेन राष्ट्रम् ॥१०७॥ मेरे वीर लोग मेरे बिना दुखी होकर देश लौट जायँगे और फिर अन्य राजाओं से मिलकर इस राज्य को बलपूर्वक नष्ट-भ्रष्ट कर देंगे ॥१०७॥ न चोत्सहे सोढुमहं मुहूर्तपि त्वदीयं विरहं वरोरु । संभाव्य ऽसामन्तजनं समस्तं समग्रयिष्यामि मनोरथं ते ॥१०८॥ वरोरु ! मैं क्षण भर भी तुम्हारा विरह नहीं सह सकता। अतः मैं शीघ्र अपने सब सामन्तों से परामर्श करके तुम्हारे मनोरथ को पूर्ण करूँगा ॥१०८॥ इतीरिता रीतिविदा प्रियेण तरङ्गितान्तःकरणा कृशाङ्गी । निश्वस्य वाष्पाम्बुभरेण पूर्णां दृशं दधे दीननमां सखीषु ॥१०९॥ रीति कुशल प्रिय से इस प्रकार सम्बोधित की गई कृशांगी का मन उद्वेलित हो उठा और उसने गहरी साँस लेकर अपनी आँसुओं से पूरी भरी हुई अत्यन्त दीन दृष्टि सखियों पर डाली ॥१०९॥ ततो भविष्यद्विरहोपतप्तं मुखेन्दुमालोक्य स कान्तिमत्याः । पाणौ समादाय दयालुरेनां निशान्तमध्यान् निशि निर्जगाम ॥११०॥ दयालु पृथ्वीराज कान्तिमती के, भावी विरह की कल्पना से सन्तप्त मुख-चन्द्र को देखकर, उसे अपने हाथों का सहारा देते हुए साथ लेकर, रात में, अन्तःपुर के बीच से रवाना हो गए ॥११०॥