भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१०६ सुजनचरितमहाकाव्यम् अतीत्य कक्षाः सुतरां स दक्षो द्वारि स्थितानां तुरगोत्तमानाम् । आच्छिद्य कञ्चिज्जविनं प्रवीणं समं कलत्रेण समारुरोह ॥१११॥ अत्यन्त दक्ष राजा, अन्तःपुर के कमरों को पार करके, बाहर द्वार पर बँधे हुए उत्तम घोड़ों में से किसी वेगशाली सधे हुए घोड़े को खोल कर अपनी स्त्री के साथ उस पर चढ़ गए ॥१११॥ द्वारि स्थितैरस्फुरितस्वकृत्यैः सविस्मयत्रासमुदीक्ष्यमाणः । जगाम तेनैव तुरङ्गमेण निजं निवेशं धरणीवतंसः ॥ ११२॥ किंकर्तव्यविमूढ द्वारपालों के भय और विस्मय से देखते देखते राजा पृथ्वीराज उसी घोड़े पर चढ़े हुए अपने शिविर में चले गए ॥११२॥ सामन्तमुख्यः समुपैत्य कश्चिन् मुदाऽथ भूपालमुदाजहार । ससाधनः साधय तावदिन्द्रप्रस्थोन्मुखस्त्वं सुमनाः सदारः ॥११३॥ फिर एक सामन्तश्रेष्ठ ने उनके पास आकर प्रसन्नतापूर्वक निवेदन किया कि आप प्रसन्न मन से साधनसहित सपत्नीक इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) की ओर प्रस्थान कर दीजिये ॥११३॥ चत्वारि यावत् किल योजनानि व्रजस्यतिक्रम्य जनाधिनाथ । तव प्रसादादहमेक एव निवारिष्यामि विरोधिसैन्यम् ॥११४॥ नरनाथ ! जब तक आप चार योजन (बत्तीस मील) न चले जायँगे तब तक आपकी कृपा से में अकेला ही शत्रु सेना को रोक रखूँगा ॥११४॥ अन्योऽब्रवीद् वीरवरः सगर्वं गव्यूतिषट्कावधियाप्तियावत् । तावन् महीशाऽहितवाहिनीनामहं निरोत्स्यामि रयं यथाद्रिः ॥११५॥ दूसरे वीर सामन्तश्रेष्ठ ने सगर्व कहा—राजन् ! जब तक आप छ गव्यूति (चौबीस मील) न चले जायँगे तब तक मैं शत्रुसेना के वेग को, नदी के वेग को पर्वत के समान, रोकूँगा ॥११५॥ एवं हरिप्रस्थगमे यथेच्छं भवन्ति यावन्त्यपि योजनानि । विभज्य तान्येव गृहीतवन्तो युद्धाय सर्वे, कृतसत्यबन्धाः ॥११६॥ इस प्रकार इन्द्रप्रस्थ तक जितने भी योजन होते थे उन सब योजनों को आपस में बाँटकर वे वीर सामन्त युद्ध के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो गए ॥११६॥ रिङ्गत्तुरङ्गं विलसच्छताङ्गमुत्तुङ्गमातङ्गमुपात्तपत्ति । स्फुरत्पताकं घनघोषघोरं सैन्यं रिपोः सन्निदधे तदानीम् ॥११७॥ इसके बाद दौड़ते हुए घोड़ों से और रथों से शोभित, बड़े-बड़े हाथियों से युक्त और सैनिकों से लसी हुई, शत्रु सेना पताका फहराती हुई और भयंकर शब्द करती हुई समीप आ गई ॥११७॥ धैर्यातिरेकादवधीर्य तत्तु पृथ्वीपतिः पूर्णमनाः प्रतस्थे । अव्यग्रचेताः पुनरग्रतोऽस्य सामन्त एकः समराय तस्थौ ॥११८॥ उत्कृष्ट धैर्य के कारण उस सेना की अवहेलना करके पृथ्वीराज पूर्ण उत्साह से इन्द्रप्रस्थ की ओर चल दिए और एक धीर चित्त वीर सामन्त युद्ध के लिए तैयार हो गए ॥११८॥ (११४-११५) योजनं क्रोशचतुष्टयं, गव्यूतिः क्रोशद्वयम् ।