सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः १०७ अथापतत् तत् प्रतिपक्षसैन्यं व्यग्रीचकारोग्ररयः स एकः । प्रतीपवातः प्रबलः खगानां व्यूहं यथा व्योमनि सञ्चरन्तम् ॥११९॥ आगे बढ़ने वाली उस शत्रुसेना को उग्रवेग वाले उन एक सामन्त ने व्यग्र कर दिया जिस प्रकार प्रबल प्रतिकूल वायु का तूफान आकाश में उड़ने वाले पक्षि-समूह को व्याकुल कर देता है ॥११९॥ प्रजह्रुरेनं युगपन् निवृत्ताः सपत्नसेनापतयोऽतिदृप्ताः । शरद्व्यपाये शतपत्रखण्डं यथा पुनः प्राणहरास्तुषाराः ॥१२०॥ अत्यन्त अभिमानी शत्रु सेनापतियों ने एक साथ मिलकर उन वीर सामन्त पर वार किया, जिस प्रकार शरद् के बीत जाने पर शीत ऋतु में फिर प्राणघातक तुषार (पाले) कमलपत्र पर प्रहार करते हैं ॥१२०॥ तस्यात्यये सत्वरमापपात पताकिनी सा जयचन्द्रगुप्ता । पीनस्तनीस्तेन उदस्तभीतिर्यया दिशा सञ्चरते स्म राजा ॥१२१॥ उन सामन्त के वीरगति प्राप्त करने पर जयचन्द्र द्वारा रक्षित सेना फिर वेग से शीघ्र उसी मार्ग पर बढ़ी जिस मार्ग से राजा पृथ्वीराज सुडौल स्तन वाली कान्तिमती को चुराकर निर्भय लिए जा रहे थे ॥१२१॥ एकैकशः क्लेशितशात्रवास्ते संहत्य सैन्यानि पुरोगतानि । तीर्णप्रतिज्ञासरितः कृतज्ञा जग्मुर्गतिं वीरजनोपदिष्टाम् ॥१२२॥ इस प्रकार एक-एक करके उन स्वामिभक्त सामन्त वीरों ने शत्रुओं को कष्ट देकर और सामने आने वाली शत्रु सेना को मार कर तथा अपनी प्रतिज्ञा-रूपी नदी पार करके वीरगति प्राप्त की ॥१२२॥ एवं प्रवृत्ते पथि सम्पराये नृपो हरिप्रस्थमुपैति यावत् । क्रमेण तावत् पृथुविक्रमास्ते स्तोकावशेषाः सुभटा बभूवुः ॥१२३॥ इस प्रकार मार्ग भर युद्ध के चलते रहने के कारण जब तक राजा पृथ्वीराज इन्द्रप्रस्थ पहुँचे तब तक उनके अत्यन्त पराक्रमी वीरगण इने-गिने बच रहे ॥१२३॥ पुरं तदासाद्य ततः समृद्धं सोमेश्वरस्यान्वयमण्डनोऽसौ । अमित्रसेनां मथनाय चक्रे मनः स्वयं मन्युरयेण दीप्तः ॥१२४॥ राजा सोमेश्वर के कुल-भूषण पुत्र पृथ्वीराज ने अपने समृद्ध इन्द्रप्रस्थ नगर में पहुँच कर, क्रोध के वेग से प्रज्वलित मन में शत्रु सेना को मथ डालने की सोची ॥१२४॥ स कान्यकुब्जाधिपतिः सुघोरं सङ्ग्राममासाद्य समाप्तसत्वः । शाकम्भरीशेन वितीर्णभङ्गो यमानुजाया निममज्ज नीरे ॥१२५॥ कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द्र का बल, पृथ्वीराज के साथ घोर युद्ध करने के कारण, समाप्त हो गया और शाकंभरी के स्वामी से हार कर वे यमुना के पानी में डूब गए ॥१२५॥