भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१०८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इति प्रतीतः प्रतिपद्य जायामनन्यलभ्यां विजयश्रियञ्च । तस्मिन् पुरे पूर्णमनोरथोऽसौ चक्रे स्थितिं कत्यपि वासराणि ॥१२६॥ इस प्रकार प्रसिद्ध वीर पृथ्वीराज ने अपनी पत्नी कान्तिमती और दूसरे के द्वारा अप्राप्य विजय- लक्ष्मी प्राप्त करके, अपने मनोरथों को पूर्ण करते हुए, कुछ दिन इन्द्रप्रस्थ में व्यतीत किए ॥१२६॥ कालेऽथ कल्पाग्निसमप्रतापो विजित्य सर्वाः स दिशः क्रमेण । शहाबुदीनाह्वयमाहवेषु महाबलं म्लेच्छपतिं बबन्ध ॥१२७॥ कल्पाग्नि के समान प्रतापी पृथ्वीराज ने धीरे-धीरे क्रमशः सब दिशाओं को जीतकर, युद्ध में, महाबलवान् शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी नामक म्लेच्छपति को पराजित कर बाँध लिया ॥१२७॥ तिग्मस्वभावं खलु राजनीतेर्दयार्द्रभावादवधीर्य धीरः । त्रिःसप्तकृत्वोऽपि निबध्य शत्रुं कारातिथीकृत्य विमुञ्चति स्म ॥१२८॥ अत्यन्त दयालु होने के कारण, धीर पृथ्वीराज ने, राजनीति के कठोर स्वभाव की अवहेलना करके, इक्कीस बार शत्रु को बाँध कर कैद किया और छोड़ दिया ॥१२८॥ तथोपकर्तारममुं कृतघ्नः कृत्वा सच्छद्मं यवनः प्रबन्धम् । नियम्य देशं निजमानिनाय किमस्त्यकार्यं बत दुर्जनानाम् ॥१२९॥ कृतघ्न शहाबुद्दीन यवन ने अपने इतने बड़े उपकारक पृथ्वीराज को छलपूर्वक पकड़ लिया और कैद करके अपने देश में ले गया। दुर्जनों के लिये कोई बात अकरणीय नहीं ॥१२९॥ तं यन्त्रितं मन्त्रितमन्दनीतिर्व्यपेतशस्त्रं विपरीतचेताः । प्रणोदितः प्राणहरेण धात्रा वियोजयामास विलोचनाभ्याम् ॥१३०॥ मन्दनीति वाले विपरीतबुद्धि शहाबुद्दीन ने, अपने प्राण हरनेवाले विधाता से प्रेरित होकर, कैद किये हुए निःशस्त्र पृथ्वीराज की दोनों आँखें निकलवा लीं ॥१३०॥ विधेः कृपारोधि विचेष्टितेन मर्मच्छिदा तेन मनस्विनोऽस्य । स्वयं निरैष्यन् नियतं नियत्या जीवोऽस्य वैरोद्धरणाय रुद्धः ॥१३१॥ विधाता की मर्मान्तिक पीड़ा देने वाली उस निर्दय चेष्टा के कारण मनस्वी पृथ्वीराज के प्राण स्वयं निकलने वाले ही थे कि उनको अवश्य विधाता ने ही, शत्रु से बदला लेकर वैर शुद्धि करने के लिए रोक दिया ॥१३१॥ असौ विदूरस्थितमित्रबन्धुरन्धः स्वयं शत्रुमुखान्तरस्थः । पारं विपद्वारिनिधेरपश्यन् प्रायोपवेशाय बबन्ध चेतः ॥१३२॥ पृथ्वीराज ने, जिनके मित्रगण और बन्धु-वर्ग बहुत दूर थे और जो स्वयं शत्रु के मुंह के अन्दर थे तथा अन्ध बना दिये गये थे, विपत्ति के समुद्र को पार करने का कोई उपाय न देख कर, अनशन करने का विचार किया ॥१३२॥ अथ भ्रमन् भूवलयं विवृण्वन् भोगावलीं भाग्यविलासभाजाम् । चन्दाभिधः पूर्वमनेन वित्तैर्मित्रीकृतस्तत्र जगाम बन्दी ॥१३३॥ भाग्यशील पुरुषों की ऐश्वर्य-परम्परा का वर्णन करते हुए भूमण्डल पर घूमनेवाले चन्द नामक चारण, जिनको पृथ्वीराज ने पहले ही धन इत्यादि देकर अपना मित्र बना रखा था, सौभाग्य से वहाँ आए ॥१३३॥