सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
१०६ सुजनचरितमहाकाव्यम् अतीत्य कक्षाः सुतरां स दक्षो द्वारि स्थितानां तुरगोत्तमानाम् । आच्छिद्य कञ्चिज्जविनं प्रवीणं समं कलत्रेण समारुरोह ॥१११॥ अत्यन्त दक्ष राजा, अन्तःपुर के कमरों को पार करके, बाहर द्वार पर बँधे हुए उत्तम घोड़ों में से किसी वेगशाली सधे हुए घोड़े को खोल कर अपनी स्त्री के साथ उस पर चढ़ गए ॥१११॥ द्वारि स्थितैरस्फुरितस्वकृत्यैः सविस्मयत्रासमुदीक्ष्यमाणः । जगाम तेनैव तुरङ्गमेण निजं निवेशं धरणीवतंसः ॥ ११२॥ किंकर्तव्यविमूढ द्वारपालों के भय और विस्मय से देखते देखते राजा पृथ्वीराज उसी घोड़े पर चढ़े हुए अपने शिविर में चले गए ॥११२॥ सामन्तमुख्यः समुपैत्य कश्चिन् मुदाऽथ भूपालमुदाजहार । ससाधनः साधय तावदिन्द्रप्रस्थोन्मुखस्त्वं सुमनाः सदारः ॥११३॥ फिर एक सामन्तश्रेष्ठ ने उनके पास आकर प्रसन्नतापूर्वक निवेदन किया कि आप प्रसन्न मन से साधनसहित सपत्नीक इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) की ओर प्रस्थान कर दीजिये ॥११३॥ चत्वारि यावत् किल योजनानि व्रजस्यतिक्रम्य जनाधिनाथ । तव प्रसादादहमेक एव निवारिष्यामि विरोधिसैन्यम् ॥११४॥ नरनाथ ! जब तक आप चार योजन (बत्तीस मील) न चले जायँगे तब तक आपकी कृपा से में अकेला ही शत्रु सेना को रोक रखूँगा ॥११४॥ अन्योऽब्रवीद् वीरवरः सगर्वं गव्यूतिषट्कावधियाप्तियावत् । तावन् महीशाऽहितवाहिनीनामहं निरोत्स्यामि रयं यथाद्रिः ॥११५॥ दूसरे वीर सामन्तश्रेष्ठ ने सगर्व कहा—राजन् ! जब तक आप छ गव्यूति (चौबीस मील) न चले जायँगे तब तक मैं शत्रुसेना के वेग को, नदी के वेग को पर्वत के समान, रोकूँगा ॥११५॥ एवं हरिप्रस्थगमे यथेच्छं भवन्ति यावन्त्यपि योजनानि । विभज्य तान्येव गृहीतवन्तो युद्धाय सर्वे, कृतसत्यबन्धाः ॥११६॥ इस प्रकार इन्द्रप्रस्थ तक जितने भी योजन होते थे उन सब योजनों को आपस में बाँटकर वे वीर सामन्त युद्ध के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो गए ॥११६॥ रिङ्गत्तुरङ्गं विलसच्छताङ्गमुत्तुङ्गमातङ्गमुपात्तपत्ति । स्फुरत्पताकं घनघोषघोरं सैन्यं रिपोः सन्निदधे तदानीम् ॥११७॥ इसके बाद दौड़ते हुए घोड़ों से और रथों से शोभित, बड़े-बड़े हाथियों से युक्त और सैनिकों से लसी हुई, शत्रु सेना पताका फहराती हुई और भयंकर शब्द करती हुई समीप आ गई ॥११७॥ धैर्यातिरेकादवधीर्य तत्तु पृथ्वीपतिः पूर्णमनाः प्रतस्थे । अव्यग्रचेताः पुनरग्रतोऽस्य सामन्त एकः समराय तस्थौ ॥११८॥ उत्कृष्ट धैर्य के कारण उस सेना की अवहेलना करके पृथ्वीराज पूर्ण उत्साह से इन्द्रप्रस्थ की ओर चल दिए और एक धीर चित्त वीर सामन्त युद्ध के लिए तैयार हो गए ॥११८॥ (११४-११५) योजनं क्रोशचतुष्टयं, गव्यूतिः क्रोशद्वयम् ।
दशमः सर्गः १०७ अथापतत् तत् प्रतिपक्षसैन्यं व्यग्रीचकारोग्ररयः स एकः । प्रतीपवातः प्रबलः खगानां व्यूहं यथा व्योमनि सञ्चरन्तम् ॥११९॥ आगे बढ़ने वाली उस शत्रुसेना को उग्रवेग वाले उन एक सामन्त ने व्यग्र कर दिया जिस प्रकार प्रबल प्रतिकूल वायु का तूफान आकाश में उड़ने वाले पक्षि-समूह को व्याकुल कर देता है ॥११९॥ प्रजह्रुरेनं युगपन् निवृत्ताः सपत्नसेनापतयोऽतिदृप्ताः । शरद्व्यपाये शतपत्रखण्डं यथा पुनः प्राणहरास्तुषाराः ॥१२०॥ अत्यन्त अभिमानी शत्रु सेनापतियों ने एक साथ मिलकर उन वीर सामन्त पर वार किया, जिस प्रकार शरद् के बीत जाने पर शीत ऋतु में फिर प्राणघातक तुषार (पाले) कमलपत्र पर प्रहार करते हैं ॥१२०॥ तस्यात्यये सत्वरमापपात पताकिनी सा जयचन्द्रगुप्ता । पीनस्तनीस्तेन उदस्तभीतिर्यया दिशा सञ्चरते स्म राजा ॥१२१॥ उन सामन्त के वीरगति प्राप्त करने पर जयचन्द्र द्वारा रक्षित सेना फिर वेग से शीघ्र उसी मार्ग पर बढ़ी जिस मार्ग से राजा पृथ्वीराज सुडौल स्तन वाली कान्तिमती को चुराकर निर्भय लिए जा रहे थे ॥१२१॥ एकैकशः क्लेशितशात्रवास्ते संहत्य सैन्यानि पुरोगतानि । तीर्णप्रतिज्ञासरितः कृतज्ञा जग्मुर्गतिं वीरजनोपदिष्टाम् ॥१२२॥ इस प्रकार एक-एक करके उन स्वामिभक्त सामन्त वीरों ने शत्रुओं को कष्ट देकर और सामने आने वाली शत्रु सेना को मार कर तथा अपनी प्रतिज्ञा-रूपी नदी पार करके वीरगति प्राप्त की ॥१२२॥ एवं प्रवृत्ते पथि सम्पराये नृपो हरिप्रस्थमुपैति यावत् । क्रमेण तावत् पृथुविक्रमास्ते स्तोकावशेषाः सुभटा बभूवुः ॥१२३॥ इस प्रकार मार्ग भर युद्ध के चलते रहने के कारण जब तक राजा पृथ्वीराज इन्द्रप्रस्थ पहुँचे तब तक उनके अत्यन्त पराक्रमी वीरगण इने-गिने बच रहे ॥१२३॥ पुरं तदासाद्य ततः समृद्धं सोमेश्वरस्यान्वयमण्डनोऽसौ । अमित्रसेनां मथनाय चक्रे मनः स्वयं मन्युरयेण दीप्तः ॥१२४॥ राजा सोमेश्वर के कुल-भूषण पुत्र पृथ्वीराज ने अपने समृद्ध इन्द्रप्रस्थ नगर में पहुँच कर, क्रोध के वेग से प्रज्वलित मन में शत्रु सेना को मथ डालने की सोची ॥१२४॥ स कान्यकुब्जाधिपतिः सुघोरं सङ्ग्राममासाद्य समाप्तसत्वः । शाकम्भरीशेन वितीर्णभङ्गो यमानुजाया निममज्ज नीरे ॥१२५॥ कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द्र का बल, पृथ्वीराज के साथ घोर युद्ध करने के कारण, समाप्त हो गया और शाकंभरी के स्वामी से हार कर वे यमुना के पानी में डूब गए ॥१२५॥
१०८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् इति प्रतीतः प्रतिपद्य जायामनन्यलभ्यां विजयश्रियञ्च । तस्मिन् पुरे पूर्णमनोरथोऽसौ चक्रे स्थितिं कत्यपि वासराणि ॥१२६॥ इस प्रकार प्रसिद्ध वीर पृथ्वीराज ने अपनी पत्नी कान्तिमती और दूसरे के द्वारा अप्राप्य विजय- लक्ष्मी प्राप्त करके, अपने मनोरथों को पूर्ण करते हुए, कुछ दिन इन्द्रप्रस्थ में व्यतीत किए ॥१२६॥ कालेऽथ कल्पाग्निसमप्रतापो विजित्य सर्वाः स दिशः क्रमेण । शहाबुदीनाह्वयमाहवेषु महाबलं म्लेच्छपतिं बबन्ध ॥१२७॥ कल्पाग्नि के समान प्रतापी पृथ्वीराज ने धीरे-धीरे क्रमशः सब दिशाओं को जीतकर, युद्ध में, महाबलवान् शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी नामक म्लेच्छपति को पराजित कर बाँध लिया ॥१२७॥ तिग्मस्वभावं खलु राजनीतेर्दयार्द्रभावादवधीर्य धीरः । त्रिःसप्तकृत्वोऽपि निबध्य शत्रुं कारातिथीकृत्य विमुञ्चति स्म ॥१२८॥ अत्यन्त दयालु होने के कारण, धीर पृथ्वीराज ने, राजनीति के कठोर स्वभाव की अवहेलना करके, इक्कीस बार शत्रु को बाँध कर कैद किया और छोड़ दिया ॥१२८॥ तथोपकर्तारममुं कृतघ्नः कृत्वा सच्छद्मं यवनः प्रबन्धम् । नियम्य देशं निजमानिनाय किमस्त्यकार्यं बत दुर्जनानाम् ॥१२९॥ कृतघ्न शहाबुद्दीन यवन ने अपने इतने बड़े उपकारक पृथ्वीराज को छलपूर्वक पकड़ लिया और कैद करके अपने देश में ले गया। दुर्जनों के लिये कोई बात अकरणीय नहीं ॥१२९॥ तं यन्त्रितं मन्त्रितमन्दनीतिर्व्यपेतशस्त्रं विपरीतचेताः । प्रणोदितः प्राणहरेण धात्रा वियोजयामास विलोचनाभ्याम् ॥१३०॥ मन्दनीति वाले विपरीतबुद्धि शहाबुद्दीन ने, अपने प्राण हरनेवाले विधाता से प्रेरित होकर, कैद किये हुए निःशस्त्र पृथ्वीराज की दोनों आँखें निकलवा लीं ॥१३०॥ विधेः कृपारोधि विचेष्टितेन मर्मच्छिदा तेन मनस्विनोऽस्य । स्वयं निरैष्यन् नियतं नियत्या जीवोऽस्य वैरोद्धरणाय रुद्धः ॥१३१॥ विधाता की मर्मान्तिक पीड़ा देने वाली उस निर्दय चेष्टा के कारण मनस्वी पृथ्वीराज के प्राण स्वयं निकलने वाले ही थे कि उनको अवश्य विधाता ने ही, शत्रु से बदला लेकर वैर शुद्धि करने के लिए रोक दिया ॥१३१॥ असौ विदूरस्थितमित्रबन्धुरन्धः स्वयं शत्रुमुखान्तरस्थः । पारं विपद्वारिनिधेरपश्यन् प्रायोपवेशाय बबन्ध चेतः ॥१३२॥ पृथ्वीराज ने, जिनके मित्रगण और बन्धु-वर्ग बहुत दूर थे और जो स्वयं शत्रु के मुंह के अन्दर थे तथा अन्ध बना दिये गये थे, विपत्ति के समुद्र को पार करने का कोई उपाय न देख कर, अनशन करने का विचार किया ॥१३२॥ अथ भ्रमन् भूवलयं विवृण्वन् भोगावलीं भाग्यविलासभाजाम् । चन्दाभिधः पूर्वमनेन वित्तैर्मित्रीकृतस्तत्र जगाम बन्दी ॥१३३॥ भाग्यशील पुरुषों की ऐश्वर्य-परम्परा का वर्णन करते हुए भूमण्डल पर घूमनेवाले चन्द नामक चारण, जिनको पृथ्वीराज ने पहले ही धन इत्यादि देकर अपना मित्र बना रखा था, सौभाग्य से वहाँ आए ॥१३३॥
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दशमः सर्गः १०९ निमग्नमेनं व्यसनाम्बुराशौ विलोक्य बन्दी स विदीर्णचेताः रहः समभ्येत्य समाहितात्मा स्वनामजाती प्रथयाञ्चकार ॥१३४॥ पृथ्वीराज को उस कष्ट-समुद्र में डूबा हुआ देखकर चन्द बरदाई का हृदय फट गया। साव- धानी से एकान्त में उनके पास जाकर चन्द ने अपना नाम और जाति प्रकट की ॥१३४॥ निरुद्धधैर्यातिशयेन वाष्पप्रवाहमन्याहततीव्रवेगम् । कण्ठस्खलद्गद्गदभाषितेन स बोधयामास कथञ्चिदेनम् ॥१३५॥ निरन्तर और तीव्र वेग वाले अश्रु-प्रवाह को अपने अतिशय धैर्य से रोकने का प्रयत्न करते हुए, गद्गद्कण्ठ से किसी प्रकार चन्द वरदाई ने उनसे यह निवेदन किया ॥१३५॥ योग्यं जगत्यामथवाप्ययोग्यं संभावितं
११० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् संभावनीयेपि नृणामपाये तदांगमाय त्वरितो नहि स्यात् । कुत्रापि दैवस्य विपर्ययेण पराजयः स्याद् विजयस्य हेतुः ॥१४२॥ विनाश की संभावना होने पर भी उसे बुलाने के लिए जल्दी नहीं करना चाहिये। हो सकता है कि विधाता की इच्छा से पराजय ही विजय का कारण बन जाय ॥१४२॥ वदन्तमेवं मृदु वन्दिनं तं प्रीत्या च नीत्या च नितान्तरम्यम् । प्रत्याहताशेषमनोरथोऽसौ प्रत्याह कृच्छ्रेण पतिः प्रजानाम् ॥१४३॥ इस प्रकार प्रीति और नीति से अत्यन्त मनोहर एवं मधुर वचन बोलनेवाले चारण को पृथ्वी- राज ने, जिनकी सारी इच्छाएं मर चुकी थीं, बड़ी कठिनाई से यह उत्तर दिया ॥१४३॥ मग्ने निकारायतनीरराशौ प्रेमानुबन्धं मयि सन्दधानः । भवानभाणीद् यदिदं विचार्य श्रद्धालुतां तत्र भजेन्न मेऽन्तः ॥१४४॥ अपमान के इस विस्तृत समुद्र में निमग्न मुझ पर उत्कट प्रेम दिखाते हुए आपने जो कुछ विचार पूर्वक कहा उसके प्रति मेरे मन में श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो पा रही है ॥१४४॥ सैन्याः सुहृद्बन्धुजनाः सहाया धनान्यथान्यान्यपि साधनानि । कार्यानुबन्धीनि भवन्ति यानि मय्येकमप्यस्ति किमङ्ग ! तेषाम् ? ॥१४५॥ प्रिय मित्र ! कार्य को सफल करने के लिए सेना, मित्रगण, बन्धु-वर्ग, सहायक, धन तथा अन्य जिन-जिन साधनों की अपेक्षा होती है उनमें से एक भी इस समय मेरे पास नहीं है ॥१४५॥ आस्तामनास्थावसतिः क्रियासु साधारणी विप्रतिपत्तिरन्या । स्वभावसिद्धं बत देहिनां यत् तदप्यपास्तं नयनद्वयं नः ॥१४६॥ अस्तु, इन बातों में सन्देह न भी हो, तो भी एक और साधारण शंका है। वह यह कि लोगों के जो स्वाभाविक दो नेत्र होते हैं मुझ अभागे के तो वे भी नष्ट कर दिए गए हैं ॥१४६॥ यथा विपाणेरिह शिल्पकार्ये यथा कदर्यस्य यशोऽर्जनेषु । तथा ममान्धस्य मनोरथोऽयं वीरोचितायां बत ! वैरशुद्धौ ॥१४७॥ अतः मुझ जैसे अन्धे के लिए वीरोचित वैर शुद्धि की इच्छा करना वैसा ही असंभव है जैसा कि हस्तहीन पुरुष के लिये शिल्पकार्य करना अथवा कापुरुष के लिये यश प्राप्त करना ॥१४७॥ ज्ञातप्रभावः पुनराह बन्दी मन्दीकरिष्यन् नृपतेरनास्थाम् । मतं मदीयं मतिमन् निशम्य रोचेत चेत् तत् त्वरितं विधेयम् ॥१४८॥ पृथ्वीराज के प्रभाव को जाननेवाले चारण ने राजा के अविश्वास को कम करने के लिए फिर यों कहा—बुद्धिमान् नरेश ! मेरी बात सुनें और यदि पसन्द आ जाय तो उसे शीघ्र पूरा करें ॥१४८॥ अनन्यसाध्यः किल शब्दवेधी बाणस्तवाधीनतरस्तरस्वी । तेनैव मन्मन्त्रसमेधितेन समीहितं साधय सावधानः ॥१४९॥ आपके पास वह वेगशाली शब्दवेधी बाण है जो औरों के पास नहीं है। मेरी बुद्धि द्वारा रचे गए जाल से परिवर्धित शक्ति वाले उस बाण से आप, सावधान होकर अपनी इच्छा पूर्ण कीजिये ॥१४९॥
दशमः सर्गः १११ निर्माय कञ्चित् कपटप्रबन्धमहं करिष्यामि तथाभ्युपायम् । यथा करस्थं तव कार्मुकं स्याच्छरव्यतां याति यथा सपत्नः ॥१५०॥ मैं कुछ न कुछ कपट जाल रचकर ऐसा उपाय करूँगा जिससे आपके हाथ में धनुष-बाण आ जाय और शत्रु निशाना बन जाय ॥१५०॥ इत्थं स निर्णीय समं नृपेण जगाम गोष्ठीं यवनाधिपस्य । दिनैः कियद्भिर्निजविद्ययाऽसावरञ्जयत् तं सह मन्त्रिमुख्यैः ॥१५१॥ राजा से इस प्रकार निर्णय करके चन्दबरदाई यवनपति शहाबुद्दीन की सभा में गए और कुछ दिनों में ही उन्होंने अपनी विद्या के कौशल से मुख्यमंत्रियों के साथ साथ शहाबुद्दीन को प्रसन्न कर लिया ॥१५१॥ अथैकदा चित्रकथाप्रसङ्गे शाहाबुदीसंसदि स प्रगल्भः । कुतूहलाद् भर्तरि सावधाने स्फीतां मुदा वाचमुदाजहार ॥१५२॥ इसके बाद एक दिन शहाबुद्दीन की सभा में जब विचित्रकथा का प्रसंग चल रहा था तब चतुर चारण ने सावधान होकर सुनने वाले शहाबुद्दीन से कुतूहलवश ये प्रसन्न वचन कहे ॥१५२॥ योऽसौ महाराज मृधे निरुध्य विनीतनेत्रो भवता निबद्धः । अयःकटाहान् विशिखेन विध्येदेकेन सोऽतीक्ष्णमुखेन सप्त ॥१५३॥ महाराज ! युद्ध में पकड़ा गया यह पृथ्वीराज, जिसे आपने अन्धा बनाकर कैद कर रखा ह, एक कुंठित बाण से सात लोहे के कड़ाह भेद सकता है ॥१५३॥ इतीरितः कालसमीरितोऽसौ तत्कालमाकारितवीरलोकः । पुराद्बहिः कौतुकदङ्गरभूमिं विशालमञ्चां रचयाञ्चकार ॥१५४॥ यह सुनकर काल से प्रेरित शहाबुद्दीन ने तुरन्त अपने वीर वर्ग को बुलाकर नगर के बाहर विशाल मंच वाली एक क्रीडाशाला बनवाई ॥१५४॥ प्रतन्यमानप्रतिनादभिन्नप्रभिन्नदिग्वारणकर्णरन्ध्रे । निरुन्धति व्योमदह्रीमुदग्रध्वनौ मुदा ताडितदुन्दुभीनाम् ॥१५५॥ समीरणासङ्गततरङ्गिताभिर्लसत्पताकाभिरलङ्कृताग्रे । अयःकटाहेषु निवेशितेषु स्तम्भे समुत्तम्भितहेमकुम्भे ॥१५६॥ सुखोपविष्टेषु यथानिवेशं प्रवीरवर्गेषु कुतूहलेन । आह्वापयामास शहाबुद्दीनः सहाऽवनीन्द्रेण स बन्दिनं तम् ॥१५७॥ जब आनन्दपूर्वक जोरों से बजाए गए नगाड़ों की उग्र ध्वनि दिग्गजों के कर्ण कुहरों को अपनी फैलती हुई प्रतिध्वनि के साथ मानों छिन्न-भिन्न करते हुये आकाश में व्याप्त हो रही थी, और जब सोने के कलश से शोभित तथा अपने ऊपर वायु के संग से फहराती हुई पताका से विलसित खम्भे पर लोहे के कड़ाह रख दिए गए थे तथा जब सब वीर गण अपने अपने स्थानों पर आराम से बैठ गए थे, तब कुतूहल के कारण शहाबुद्दीन ने एक राजा को भेज कर उस कैदी (पृथ्वीराज) को बुलाया ॥१५५-१५७॥ (१५७) अवनीन्द्रेण सह केनचित् राज्ञा सह । वन्दिनं बन्दीकृतं पृथ्वीराजम् ।
११२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्वलन्तमन्तर्व्यसनस्य तापाच्छ्वसन्तमुच्चैरनुवेलमुष्णम् । विशीर्णसर्वव्यवसायसत्वं दृष्टं विना दृष्टिविषं यथैकम् ॥१५८॥ प्रतिद्विपास्कन्दनभिन्नदन्तं द्विपं यथा क्षीणमदप्रवाहम् । स्वर्भानुसंभिन्नमिवार्कबिम्बमार्द्रेन्धनेनेव विरूणमग्निम् ॥१५९॥ पकड़े हुये साँप के समान अपमान की भयंकर वेदना के सन्ताप से अन्दर ही अन्दर जलता हुआ, लगातार लम्बी और गरम साँसें लेता हुआ, नेत्रों के बिना जिसकी सब कार्य-प्रवृत्ति सुधबुध हीन हो गई थी ऐसा वह कैदी, प्रतिद्वन्द्वी हाथी के प्रहारों से जिसके दाँत टूट गए हों और पराजय के दुःख से जिसका मद-प्रवाह क्षीण हो गया हो ऐसे हाथी के समान, राहु से ग्रस्त चन्द्रबिम्ब के समान और गीले ईंधन के कारण धुँआ दे-देकर रो-रोकर जलने वाली आग के समान लग रहा था ॥१५८-१५९॥ जयश्रियः कार्मणमन्यवीरैर्दुर्नमनं कार्मुकमस्य पाणौ । निवेशितं पार्श्वचरैः शनैश्च शहाबुदीनस्य तदा निदेशात् ॥१६०॥ अन्य वीरों से न झुकाये जानेवाले तथा जय-लक्ष्मी को प्राप्त करने में कुशल धनुष को शहाबुद्दीन के आदेश से उसके अनुचरों ने पृथ्वीराज के हाथ में दे दिया ॥१६०॥ अनादरारोपितशिञ्जिनीके संयोजिते तत्र शरेण चापे । बन्दी बभाषे बहुलीकृतेन स्वरेण शृण्वत्यधिपे धरित्र्याः ॥१६१॥ जब पृथ्वीराज अनादर से उस धनुष को झुकाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा चुके और उस पर बाण रख चुके तब चारण ने पृथ्वीराज तक सुनाई देने वाले उच्चस्वर से कहा ॥१६१॥ उच्चैर्महाराज यदा निदेशं वारत्रयं श्रोष्यति युष्मदीयम् । शरेण कुण्ठेन धनुर्धरोऽयं लक्ष्यं तदा भेत्स्यति वः समक्षम् ॥१६२॥ महाराज ! उच्च स्वर में दिये गये आपके आदेश को जब यह तीन बार सुन लेगा तब यह धनुर्धर आपके सामने ही कुंठित बाण से निशाना भेद देगा ॥१६२॥ तथेति तस्य प्रहरेति वक्तुं व्यात्ताननस्य क्षततालुमूलः । प्राणैः सहानुङ्करणस्य शत्रोर्जवान् नियन्तुर्निर्याय बाणः ॥१६३॥ तब ज्यों ही शहाबुद्दीन ने "बाण चलाओ" यह कहने के लिए मुँह खोला त्यों ही धनुर्धर पृथ्वी- राज का शब्दवेधी बाण उन्हें अन्धा कर देनेवाले शत्रु के प्राणों को साथ लेकर उसके कण्ठतालु को फोड़ता हुआ वेग से पार निकल गया ॥१६३॥ (
१५ दशमः सर्गः ११३ निपीतयन् वैरमतीव तीव्रं यशो वितन्वन् विशदं जगत्याम् । फलेन हीनोऽपि महाफलोऽभूत् पृथ्वीपतेस्तस्य तदा पृषत्कः ॥१६४॥ पृथ्वीराज का वह बाण यद्यपि फल (बाण का नोकीला सिरा) से हीन अर्थात् कुंठित था तो भी अत्यन्त उग्र वैर का बदला लेने के कारण और संसार में शुभ्र यश फैलाने के कारण वह महान् फल देने वाला सिद्ध हुआ ॥१६४॥ भयविस्मयशोकसङ्कुलान्तःकरणैर्वीरगणैरलक्ष्यमाणः । अधिरोप्य वनायुजं स बन्दी क्षितिपालं कुरुजाङ्गलं निनाय ॥१६५॥ भय, आश्चर्य और दुःख से व्याकुल चित्त वाले यवन वीरों की नजर बचा कर चन्द वरदाई पृथ्वीराज को अरबी घोड़े पर बैठाकर कुरुजांगल देश ले आये ॥१६५॥ पुण्यक्षेत्रे तत्र सत्क्षत्रियाणां दत्तानन्दे शौर्यशौटीर्यभाजाम् । पृथ्वीलोकं पूरयित्वा यशोभिः पृथ्वीराजः प्रार्थितं प्राप लोकम् ॥१६६॥ शूरवीरों को आनन्द देनेवाले और श्रेष्ठ क्षत्रियों के पुण्यक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, पृथ्वीराज, अपने यश को पृथ्वीलोक में फैलाकर, अपने वांछित लोक (स्वर्ग) को चले गए ॥१६६॥ इति श्री सुर्जनचरितमहाकाव्ये दशमः सर्गः।
एकादशः सर्गः तस्मिन् गते पुण्यकृतां प्रयाते प्रह्लादनामा तनयस्तदीयः । प्रह्लादयन् मानसमानतानां समुद्रकाञ्चीं सुमनाः शशास ॥ १ ॥ पृथ्वीराज के पुण्यात्मा पुरुषों की गति (स्वर्गलोक) प्राप्त करने पर उनके पुत्र प्रह्लाद, विनीत जनों के मनों को आह्लाद देते हुए, समुद्ररशना पृथ्वी पर शासन करने लगे ॥ १ ॥ नितान्तभक्त्या भगवत्युपेन्द्रे सत्वप्रधानैश्च गुणैरगण्यैः । मनीषिणोऽमंसत मर्त्यमूर्ति प्रह्लादमेव क्षितिपालमेनम् ॥ २ ॥ असंख्य सत्वगुण प्रधान गुणों से और भगवान् विष्णु में आत्यन्तिक भक्ति होने से राजा प्रह्लाद को बुद्धिमान् लोग मनुष्य-शरीरधारी प्रह्लाद ही मानते थे ॥ २ ॥ गोविन्दराजं रजसोज्झितात्मा तनूजमात्मीयपदेऽभिषिच्य । यशोवदातैः सुकृतैरुपार्त्तैः पौरन्दरे धाम्नि स निर्ववार ॥ ३ ॥ रजोगुण से विमुक्त मनवाले प्रह्लाद ने, राज्य-
एकादशः सर्गः ११५ आयोधनेष्वेव धनञ्जयाद्या विश्राणनेष्वेव दधीचिमुख्याः । धर्मात्मजाद्याः खलु धर्ममात्रे सर्वत्र वीरः स तु भूरिसत्त्वः ॥८॥ अर्जुन आदि केवल युद्धवीर थे। दधीचि आदि केवल दानवीर थे। युधिष्ठिर आदि केवल धर्मवीर थे। किन्तु महान् पराक्रमी हम्मीरदेव एक साथ युद्धवीर, दानवीर और धर्मवीर थे ॥८॥ चित्रैश्चरित्रैः प्रथितस्य यस्य सम्भावितस्यापि विशालशीलैः । गुणोच्चयं वर्णयतां कवीनां वाणी न सत्यव्रतमुज्झति स्म ॥९॥ (प्रायः कवियों के वर्णन में थोड़ी बहुत अत्युक्ति होती ही है, किन्तु) नाना प्रकार के श्लाघ्य चरित्रों के कारण विख्यात और विशाल शील वाले तथा महापुरुषों द्वारा भी सम्मानित हम्मीरदेव क गुण-समूह का वर्णन करने वाले कवियों की वाणी सत्यव्रत को जरा भी नहीं छोड़ती ॥९॥ आश्चर्यमस्याऽवनिनायकस्य ज्वलत्प्रतापज्वलनोऽनुवेलम् । विपक्षनारीनयनाम्बुपूरैः प्रपूर्यमाणः परिव
११६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् समुद्रनेमिं स विजित्य वीरः कृत्वाऽवनीशान् करदान् क्रमेण । उपाद्रवद् वाजिबलेन दृप्यद्वरूथिनीकांस्तरसा तुरुष्कान् ॥१५॥ वीर हम्मीरदेव ने समुद्र-रशना पृथ्वी को जीतकर क्रमशः राजाओं को कर देनेवाला बनाया और अपनी अश्व-सेना द्वारा गर्वयुक्त सेना वाले यवनों को वेग से खदेड़ भगाया ॥१५॥ शकान् निराकृत्य बकानुकारान् स्वपौरुषेणैव स राजहंसः । पद्माकरं शीलितसाधुचक्रं सुखेन दिल्लीनगरं जगाहे ॥१६॥ जिस प्रकार राजहंस बगुलों को भगा कर साधु पुरुषों द्वारा सेवित तथा कमलों से सुशोभित सरोवर में विहार करता है, उसी प्रकार हम्मीर रूपी राजहंस ने अपने पराक्रम से यवन-रूपी बगुलों को भगा कर साधु पुरुषों के समूह से सेवित और लक्ष्मी से सुशोभित दिल्ली नगर पर अधि- कार कर लिया ॥१६॥ सैन्यानि विद्राव्य स यावनानि दूरन्तमांसीव समुद्ध
एकादशः सर्गः ११७ उसी प्रकार सूर्य भी दिन पर प्रजा को अपने करों (किरणों) का सहारा देकर सायंकाल करों को समेट लेते थे। अतः सूर्य हम्मीर के प्रतिद्वन्द्वी हुए। इसलिये हम्मीर के प्रताप ने मित्र (सूर्य) को प्रतिपक्षी होने के कारण शत्रु के समान अपने गुणों (रस्सों) से बाँध लिया अर्थात् हम्मीर के प्रताप के आगे सूर्य भी फीका पड़ गया) ॥२०॥ समाप्तकृत्यः प्रशमादरोणां नृपः स्वपुर्यामनयन् नयज्ञः । कालं कियन्तं किल यन्त्रितोऽसौ समुत्सुकानां प्रणयात् प्रियाणाम् ॥२१॥ शत्रुओं का दमन कर देने के कारण कार्य से निवृत्त नीति-कुशल राजा ने, अत्यन्त उत्सुक प्रियाओं के प्रेम-बन्धन के कारण, कुछ समय अपनी नगरी में बिताया ॥२१॥ पुरो हितेन स्वपुरोहितेन पुरस्कृतैर्भूमिमुरैः परीतः । नृपः प्रतस्थे सहपट्टराज्ञ्या स पट्टनाख्यं पुटभेदनं तत् ॥२२॥ सदा हित करने वाले राजपुरोहित जिनके प्रमुख थे ऐसे ब्राह्मणों से घिरे हुए राजा हम्मीरदेव ने अपनी पटरानी के साथ पट्टन (केशवराय पाटन) नामक नगर की ओर प्रस्थान किया ॥२२॥ ययुश्च तस्यानुपदं सदस्याः सदोशितुश्चित्तविदो वयस्याः । मन्त्रप्रधानाः सचिवास्तथान्ये नियोजिताः कोशगृहाधिकारे ॥२३॥ उनके पीछे-पीछे सभासद, श्रेष्ठ स्वामी की चित्तवृत्ति को जाननेवाले मित्र, मन्त्रकुशल मन्त्रीगण और कोषाधिकारीगण चले ॥२३॥ निरामया नीरधितोरजाताः समोरिता वल्लभपालमुख्यैः । जग्मुर्युवानः शतशो विनीता जवेन वाहा जितवैनतेयाः ॥२४॥ समुद्रतट पर उत्पन्न होने वाले और अपने वेग से गरुड़ को भी जीतनेवाले सैकड़ों जवान और निरोगी घोड़े अपने प्रिय सक्टरों से प्रेरित होकर विनयपूर्वक चले ॥२४॥ उत्तुङ्गतप्ताजितशैलशृङ्गं मातङ्गसैन्यं शनकैः प्रतस्थे । कलिङ्गराजेन कलिप्रशान्त्यै बलीयसोऽमुष्य बलीकृतं यत् ॥२५॥ अपनी ऊँचाई से पर्वतों के शिखरों को मात करनेवाली हाथियों की सेना, जिसे कलिंग देश के राजा ने कलह (युद्ध) की शान्ति (सन्धि) के लिए बलवान् हम्मीरदेव को भेंट किया था, धीरे-धीरे चली ॥२५॥ अथापतत् पत्रिरजवैः स वाहैस्तीरं तिलद्रोणितरङ्गवत्याः । तरङ्गसङ्गत्वरगन्धवाहस्निग्धीकृतच्छायतमालमालम् ॥२६॥ पक्षियों के समान वेग से हवा में उड़ने वाले घोड़ों से युक्त राजा हम्मीरदेव तिलद्रोणि (दूणी) नदी के, लहरों का आलिंगन करने वाले वायु के कारण स्निग्धच्छाया वाले तमाल वृक्षों की पंक्ति से शोभित तीर पर पहुँचे ॥२६॥ (२५) कलिः कलहः । बलीकृतमुपहारीकृतम् ।
११८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नदीं तिलद्रोणिमदीनसत्वः स तां जगाहे गहनप्रवाहाम् । यस्याः स्पृशन् पावनमम्बुबिन्दुं पापोऽपि तापत्रितयं जहाति ॥२७॥ पराक्रमी राजा ने गहरे प्रवाह वाली तिलद्रोणि नदी में स्नान किया, जिस नदी के पवित्र जलबिन्दु का स्पर्श करके पापी भी त्रिविध ताप (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) से मुक्त हो जाता है ॥२७॥ स्फुरन्महानीलमणीमनोज्ञं कदम्बमालाकलितोपकण्ठम् । सुपर्णसम्पादितसौम्यपादच्छायं मयूरच्छदचित्रमौलिम् ॥२८॥ उपात्तरत्नैः कटकैरशून्यं पीताम्बरोत्तङ्गकलेवराढ्यम् । मुखानिलापूरितवेणुरन्ध्रनिनादसंमोहितवन्यरामम् ॥२९॥ श्रियं दधानं भृगुपादजानां हिरण्यगर्भं दधतं तथान्तः । विलोकयामास स पारियात्रं गिरि मुरारातिमिवाऽवनीशः ॥३०॥ देदीप्यमान नीलम मणियों से मनोहर अथवा देदीप्यमान नीलमणि के समान श्याम कान्ति से शोभित ('नीलमणि' भगवान् कृष्ण का नाम भी है), कदम्बमाला से शोभित कण्ठ वाले, अपने वाहन गरुड़ में प्रतिबिम्बित सुन्दर पैरों की कान्ति वाले, मयूरपंख की शोभा को मस्तक पर धारण करने वाले, हाथों में रत्नजड़ित कड़े पहनने वाले, उन्नत शरीर में पीताम्बर (पीला रेशमी वस्त्र) धारण करने वाले, मुख की वायु से बजाई गई मुरली के छेदों से निकलनेवाली ध्वनि से गोपियों का मन मोहित करने वाले, महर्षि भृगु के पादप्रहार जन्य चिह्न को लक्ष्मी के समान वक्षःस्थल पर धारण करने वाले और हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को अपने नाभि-कमल के अन्दर धारण करने वाले भगवान् कृष्ण के समान, देदीप्यमान नीलम मणियों से मनोहर, कदम्ब वृक्षों की पंक्ति से शोभित उपत्यका वाले, सुन्दर पत्तों वाले वृक्षों की घनी छाया से शोभित, अपने शिखर पर नाचने वाले मयूरों के रंग-बिरंगों पंखों से सुन्दर, रत्नों की खान वाले मध्यभाग से युक्त, उच्च शिखरों पर छाये हुए पीले आकाश से शोभित, गुफाओं से निकलने वाले वायु से बजाये गये बाँसों के छेदों से निकलने वाली ध्वनि से वन की स्त्रियों को मोहित करने वाले, तटहीन प्रताप के पास उगने वाले वृक्षों की शोभा को धारण करने वाले और अपने गर्भ में सोने की खान को धारण करने वाले पारियात्र (अरावली) पर्वत को हम्मीरदेव ने देखा ॥२८-३०॥ सात्राजितीसौहृदभङ्गभीरोः प्राक् पारिजातं हरतो मुरारेः । पुलोमजावर्धितमत्सरेण वृत्रद्विषा यत्र रणः प्रवृत्तः ॥३१॥ प्राचीन काल में, सत्राजित् की पुत्री सत्यभामा के प्रणयभंग के भय से, स्वर्ग से पारिजात हर लाने वाले भगवान् कृष्ण से, अपनी पत्नी शची द्वारा बढ़ाये गये क्रोध वाले इन्द्र ने इस पारि- यात्र पर्वत पर युद्ध छेड़ा था ॥३१॥ (२८) सुपर्णानि सुन्दराणि वृक्षपत्राणि । सुपर्णः गरुत्मान् । (२९) कटकं कराभरणमद्रिनितम्बश्च । अम्बरमाकाशं वस्त्रञ्च । (३०) भृगुः महर्षिभृगुः अतटप्रपातश्च । (३१) सात्राजिती सत्राजितस्य कन्या कृष्णपत्नी सत्यभामा ।
एकादशः सर्गः १११ तार्क्ष्यस्य पक्षातिरयात् पतिष्णोः सुरेन्द्रनागस्य शरीरभारात् । अवाप्तभङ्गानि यदस्य शृङ्गाण्यतोऽरुणन्नाहणवर्त्म शैलः ॥३२॥ झपटने वाले गरुड़ के पंखों के वेग से और इन्द्र के ऐरावत हाथी के शरीर के बोझ से इस पारियात्र पर्वत के शिखर टूट गये थे, यही कारण था कि इस पर्वत ने सूर्य के मार्ग को नहीं रोका ॥३२॥ हृत्वा यशोभिः सह वृत्रशत्रोः सुरद्रुमालीं सुरभिं सभार्यः । यस्मिन् विशश्राम भवश्रमार्तविश्रामभूमिर्भगवान् मुकुन्दः ॥३३॥ वृत्रशत्रु इन्द्र के यश के साथ-साथ उसके सुगन्धित पारिजात वृक्ष को हर कर, सत्यभामा के साथ भगवान् कृष्ण ने, जो स्वयं मुकुन्द (मोक्षदाता) होने के कारण संसारदुःख से पीड़ित मनुष्यों की विश्रामभूमि हैं, इस पारियात्र पर्वत पर विश्राम किया था ॥३३॥ स भूभृतं भूमिभृतां वरीयान् निषेवितं नाकसदां निकायैः । बभ्राम बिभ्राणमनल्पतीव्रतपोजुषां पावनपर्णशालाः ॥३४॥ राजाओं में श्रेष्ठ हम्मीरदेव, देव-वृन्दों से सेवित तथा उग्र तप करने वाले ऋषियों की पवित्र पर्णकुटियों को धारण करने वाले उस पारियात्र पर्वत पर घूमे ॥३४॥ तस्यान्तरे शान्तरजाः स राजा सुदुर्भालोकनमन्यलोकैः । व्यलोकयद् बिल्वपलाशमूले बिल्वेश्वरं वल्लभमीश्वरायाः ॥३५॥ तत्पश्चात् रजोगुण को जीतने वाले राजा हम्मीर ने, अन्य पुरुषों के लिये दुर्लभ-दर्शन पार्वती- प्रिय बिल्वेश्वर महादेव के, जो एक विल्ववृक्ष की जड़ के पास, विराजमान थे, दर्शन किये ॥३५॥ विडौजसं वीर्यवता विजित्य महं महीध्रस्य महामहिम्नः । विधित्समानेन सनातनेन यः स्थापितः पावितविश्वलोकः ॥३६॥ महा बलवान् सनातन पुरुष भगवान् कृष्ण ने , इन्द्र को जीत कर, विजयोत्सव द्वारा महान् महिमा वाले पारियात्र पर्वत का गौरव बढ़ाने के निमित्त, विश्व को पवित्र करने वाले बिल्वेश्वर महादेव को वहाँ स्थापित किया था ॥३६॥ विधाय भक्त्या विधिवत् सपर्यां प्रजेश्वरः पञ्चमुखस्य तस्य । वितीर्य तीर्थोचितभूरिदानमानन्दयद् ब्राह्मणवर्गमग्र्यम् ॥३७॥ राजा हम्मीरदेव ने उन बिल्वेश्वर महादेव की भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा की और तीर्थो- चित विपुल दान देकर प्रथमवर्ण ब्राह्मण-वर्ग को आनन्दित किया ॥३७॥ ततः पुरं षट्पुरनामधेयमध्यास्त विध्वस्ततमोविकारः । यदाश्रयाद् बुद्धिभृतां नराणां षड्वैरिणो न स्वपुरं विशन्ति ॥३८॥ तत्पश्चात् अपने तमोगुण (और अज्ञान) के विकार को नष्ट कर देने वाले हम्मीरदेव षट्पुर (खटकड़) नामक नगर में पहुँचे जहाँ रहने वाले बुद्धिमान् पुरुषों के शरीर में षड् वैरी (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य रूपी छ शत्रु) प्रवेश नहीं कर पाते ॥३८॥
१२० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् स पट्टनाख्यं नगरं पटीयः फलप्रकर्षे विहितक्रियाणाम् । अलञ्चकाराशु हृतान्तरायः सुनीतिवर्त्मैव मनःप्रसादः ॥३९॥ जिस प्रकार (सत्वगुण जन्य) मनःप्रसाद विघ्नों को दूर करके सुनीतिमार्ग को अलंकृत करता है, उसी प्रकार विघ्नों को दूर करने वाले एवं सत्वगुणसम्पन्न राजा हम्मीर ने विहित कर्मों का उत्तम फल देने में निपुण पट्टन (केशवराय पाटन) नामक नगर को शीघ्र ही अलंकृत किया ॥३९॥ सुराङ्गनावर्जितपारिजातप्रसूनपर्याप्ततरङ्गशोभा । चर्मण्वती शर्ममयप्रवेणी प्रवीणयामास यशांसि यस्य ॥४०॥ (स्नान करने के लिये आई हुई) स्वर्ग की देवियों द्वारा लाये गये पारिजात पुष्पों से जिसकी लहरों की शोभा बढ़ रही है ऐसी मंगलमय प्रवाह वाली चर्मण्वती (चम्बल) नदी हम्मीरदेव के यश को अपने कल-कल शब्दों द्वारा मानों वीणा बजा कर गाया करती है ॥४०॥ चर्मण्वतीवारिणि धर्मपत्न्या समं समाप्याऽभिषवं स वीरः । संसिद्धिदात्रीं विमलोपचारैरानर्च मृत्युञ्जयमञ्जुमूर्तिम् ॥४१॥ वीर हम्मीर ने अपनी धर्मपत्नी के साथ चर्मण्वती के जल में स्नान करके उत्तम सिद्धि देने वाली मृत्युंजय महादेव की सुन्दर मूर्ति की शुद्ध उपचारों से पूजा की ॥४१॥ भासामथो भर्तरि सोपरागे विश्राणनेषु प्रथितानुरागः । अन्यैरतुल्योऽपि तुलामुदारः सधर्मदारः सुखमारुरोह ॥४२॥ उस समय सूर्यग्रहण होने पर, दान देने में अत्यन्त अनुरागी उदार हम्मीरदेव, अन्य-पुरुषों से अतुलनीय होने पर भी, अपनी धर्मपत्नी के साथ सुख से तुला पर चढ़े ॥४२॥ स्वच्छत्वसाद्गुण्यसुवृत्तताभिर्मुक्तामणीनां गुरुवंशजानाम् । साम्यं समीचीनमनेन तावत् परन्तु नाऽसौ नृपतिः सरन्ध्रः ॥४३॥ स्वच्छता, सद्गुणता (मोती उत्तम गुण अर्थात् सूत्र में पिरोये जाते हैं; हम्मीर में उत्तम गुण थे), सुवृत्तता (मोतियों में सुन्दर गोलाई होती है; हम्मीर में सच्चरित्रता थी) आदि के कारण उत्तम वंश में उत्पन्न होने वाले मोतियों में (जो तुला के दूसरे पलड़े में चढ़ाये गये थे) और उत्तम वंश में उत्पन्न हम्मीरदेव में तुलना के लिये समानता उचित थी, किन्तु केवल एक अन्तर था—वह यह कि मोती 'सरन्ध्र' (छेद वाले) थे और हम्मीर के राज्य में कोई 'रन्ध्र' (छेद या कमी) नहीं था ॥४३॥ कामं महार्घैरपि गौरवाढ्यैर्वज्रैः समग्रा तुलना न राज्ञः । स केवलं वैरिणि वज्रतुल्यो मित्रेऽतिमात्रं मृदुलस्वभावः ॥४४॥ (तुला के दूसरे पलड़े पर जो हीरे चढ़ाये गये थे उन) बहुमूल्य और भारी वज्रों (हीरों) में और अमूल्य एवं गौरवान्वित हम्मीर में सम्पूर्ण समानता नहीं थी क्योंकि हम्मीर केवल शत्रुओं के लिये ही वज्रतुल्य थे, किन्तु मित्रों के लिये अत्यन्त कोमल थे ॥४४॥ (४२) उपरागो ग्रहणम् । (४४) वज्रमिन्द्रायुधं हीरकञ्च ।
१६ एकादशः सर्गः १२१ आरोप्यमाणानि तुलां धनानि यथा यथा वृद्धिमवापुरस्य । तथा तथा चेतसि वैदिकानां मनोरथा नैव समुद्दिजानाम् ॥४५॥ तुला के दूसरे पलड़े पर चढ़ाये जाने वाले हीरे, मोती, सुवर्ण आदि धन जैसे-जैसे बढ़ते गये वैसे-वैसे ही वैदिक कर्मकाण्डी ब्राह्मणों के चित्तों में बढ़ने वाले मनोरथ नहीं समाये ॥४५॥ विश्वम्भरोऽस्मिन् निवसन्रजस्रं देहेऽपि तावद् गुरुतां निधत्ताम् । भूयिष्ठमित्थं मिलिताः सभायामाशासते स्म क्षितिदेवमुख्याः ॥४६॥ सभा में एकत्रित अनेक ब्राह्मण-श्रेष्ठ यह प्रार्थना कर रहे थे कि विश्वंभर भगवान् विष्णु जो राजा में निरन्तर निवास करते हैं कृपया इनके शरीर को भी भारी बना दें। (राजा को भगवान् का अंश माना गया है। अथवा हम्मीर भगवान् के भक्त थे अतः वे निरन्तर उनके हृदय में निवास करते थे) ॥४६॥ स स्थूललक्षः सुमनास्तदानीं स्थूलं वपुः स्वं बहुमन्यते स्म । व्यायामलीलाविभवान् निकामं कुक्षिं कृशं केवलमन्वशोचत् ॥४७॥ दानवीर महात्मा हम्मीर ने उस समय अपने स्थूल शरीर को बहुत अच्छा माना । केवल व्यायाम करने के कारण पतली कमर के लिये ही उन्हें सोच हुआ ॥४७॥ उच्चैस्तरोऽभून् नृपतिस्तदानीं भरातिनम्रात् किल रत्नराशेः । तत्त्वादृगुच्चैःशिरसां जनानामुच्चैःपदारोहणमेव युक्तम् ॥४८॥ उस समय तुला के दूसरे पलड़े के, रत्नसमूह के भार के कारण, नीचे हो जाने से राजा हम्मीर ऊँचे उठ गये । उन जैसे उन्नत शिर वाले महापुरुषों के लिये उच्च पद प्राप्त करना ठीक ही था॥४८॥ नीता नितम्बस्तनभारभाजा मुदं कृशेनापि शरीरकेण । आरोपितास्तत्र तुलां सुरत्नैर्न्या महिष्योऽपि महीश्वरेण ॥४९॥ राजा हम्मीर ने, कृश शरीर होने पर भी नितम्ब और स्तनों के भार के कारण प्रसन्न होने वाली अन्य रानियों को भी उत्तम रत्नों से तुलवाया ॥४९॥ रत्नानि यत्नेन तुलाधृतानि कुलागतेभ्यः प्रथमं द्विजेभ्यः । विभज्य सम्प्राप्तवतो दिगन्तात् सम्भावयामास यथार्हमन्यान् ॥५०॥ तुलादान के उन रत्नों को (एवं मोती, स्वर्ण आदि को) बाँट कर राजा ने पहले कुलपर- म्परागत ब्राह्मणों का और फिर अन्य देशों से आये हुये ब्राह्मणों का यथोचित संत्कार किया ॥५०॥ शुभौ वसूनामधिपौ तदानीं तुलारूढौ तरणिर्नृपश्च । सङ्कोचयामास करं तमोन्धः पूर्वस्तयोर्मुक्तकरः परोऽभूत् ॥५१॥ उस समय वसु (आदित्य देवता; धन) के स्वामी एवं कल्याणकारी, सूर्य और राजा हम्मीर ये दोनों ही तुला (तुलाराशि ; तराजू) पर अधिरूढ़ हुये । उनमें से प्रथम ने (सूर्य ने) तम (राहु) (४७) स्थूललक्षः दानशौण्डः । (५१) वसूनां देवानां धनानाञ्च । तुलायां तुलाराशौ तुलायाञ्च । तमोऽन्धस्तमसा राहुणा अन्धो ग्रस्तः।
१२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् से अन्ध (ग्रस्त) होकर (अज्ञानान्ध तामसी कंजूस की तरह) अपने करों (किरणों; हाथों) को खींच लिया, किन्तु दूसरे ने (हम्मीर ने) मुक्तकर होकर (हाथ खोलकर) दान दिया (अथवा कर माफ़ कर दिया) ॥५१॥ हम्मीरदेवेन वितीर्यमाणाः पयः सुरभ्यः करिणो मदाम्भः । यत् तत्त्यजुस्तेन सरित्समूहः शरत्कृतं कार्श्यमपोहति स्म ॥५२॥ हम्मीरदेव द्वारा दान दी गई गायों से और दान दिये गये हाथियों से, क्रमशः जो दूध की और मद-जल की धारायें बहीं उनके कारण नदियों की, शरद्-ऋतु में होने वाली जल की कमी, दूर हो गई ॥५२॥ उपप्लवोऽभूत् स कृतोपकारः कुर्वन् शरीरावरणं खरांशोः । तुरङ्गदानावसरे न यस्मात् सस्मार देवोऽयममुष्यरथ्यान् ॥५३॥ ग्रहण के समय राहु ने सूर्यबिम्ब को ढक लिया था, किन्तु सूर्य ने इसे अपना उपकार समझा क्योंकि इस आवरण के कारण घोड़ों के दान के समय हम्मीरदेव को सूर्य के घोड़े याद नहीं आये ॥५३॥ गजाधिपाः केऽपि हयाधिपत्यमन्ये गता भूपतयः परे च । किमन्यदस्मिन् वितरत्यभीक्ष्णं वित्तेशतां विप्रगणाः प्रपन्नाः ॥५४॥ हम्मीर देव के निरन्तर दान देते रहने के कारण कोई गजपति, कोई अश्वपति और कोई भूपति बन गये; अधिक क्या कहें, विप्र लोग भी वित्तेश (कुबेर) बन गये ॥५४॥ मुक्ताकलापे पतिता द्विजानां प्रसूनदामभ्रमतो द्विरेफाः । विलेपनामोदविलीनचित्ता नोत्पेतुरुच्चैरपि वार्यमाणाः ॥५५॥ ब्राह्मणों के मोतियों के हार पर पुष्पमाला के भ्रम से भ्रमर टूट पड़े और चन्दन के तिलक की सुगन्ध से मस्त होकर जोरों से हटाने पर भी नहीं हटे ॥५५॥ कस्यापि कुत्रापि कदाचिदेव याल्पं प्रसूते स्म वसु प्रसन्ना । वनीयकानामवनिस्तदानीं सा रत्नसूः सर्वत एव जाता ॥५६॥ जो भूमि प्रसन्न होने पर किसी किसी के लिये कहीं-कहीं कभी-कभी थोड़ा सा धन उत्पन्न करती है वह भूमि उस समय याचकों के लिये भी सदा और सर्वत्र रत्नों को उत्पन्न करने लगी ॥५६॥ अशेषदानानि स दीनबन्धुरशेषयित्वा स्वयमेव विज्ञः । न्यवेदयद् वेदविदोऽवदातानुपक्रमायाऽद्भुतसप्ततन्तोः ॥५७॥ बुद्धिमान् और दीनवत्सल हम्मीरदेव ने, जब सब प्रकार के दान दिये जा चुके तब वेदज्ञ और पुण्यात्मा ब्राह्मणों से अद्भुत यज्ञ का आयोजन करने की प्रार्थना की ॥५७॥ (५३) उपप्लवो ग्रहणम् ।
एकादशः सर्गः १२३ कुण्डान्यखण्डानि समेखलानि समानि सम्यग् विरचय्य विप्राः । आरेभिरे कोटिमखं कृतज्ञा मुहूर्तमासाद्य मनोऽनुकूलम् ॥५८॥ वेदविधि में निपुण ब्राह्मणों ने अपने मन के अनुकूल शुभ मुहूर्त में अखण्ड, बराबर और मेखला युक्त यज्ञ-कुण्ड बनाकर कोटियज्ञ (वह यज्ञ जिसमें एक करोड़ आहुतियाँ दी जाती हैं) प्रारम्भ किया ॥५८॥ विशुद्धवर्णोज्वलसामिधेनीसंस्कारमासाद्य समेधमानः । समिद्भिराज्यैरपि हूयमानः स सप्तजिह्वोऽपि सहस्रजिह्वः ॥५९॥ वेद की विशुद्ध वर्णों से उज्ज्वल 'सामिधेनी' नामक ऋचाओं से (वे ऋचायें जिनका पाठ करके समिधाओं की आहुतियाँ दी जाती हैं) संस्कृत होकर समिधाओं के हवन से प्रवृद्ध एवं हव्य पदार्थ और घृत की आहुतियों से प्रज्वलित यज्ञ के अग्निदेव 'सप्तजिह्व' कहलाने पर भी 'सहस्र- जिह्व' होकर (सहस्र ज्वालाओं के साथ) प्रकट हुए ॥५९॥ विशुद्धमन्त्रेरितहव्यगन्धं घ्राणोपयुक्तं हरितां दधानः । वितानवैश्वानरगन्धवाहः सुधाभुजां संसदमाचकर्ष ॥६०॥ विशुद्ध वेदमन्त्रों द्वारा यज्ञाग्नि में हवन किये गये हव्य की दिशाओं की नासिका को अत्यन्त प्रिय लगनेवाली सुगन्ध को धारण करने वाला यज्ञाग्नि का हव्यगन्धित वायु देवताओं की सभा को (आहुतियाँ ग्रहण करने के लिये) खींच लाया ॥६०॥ तस्मिन् मखे मेध्यतमोऽन्तरिक्षे समन्ततो यः समियाय धूमः । तमङ्कपालोकृतमिन्दुनाङ्कनाम्ना प्रसिद्धिं जनता निनाय ॥६१॥ उस यज्ञ में यज्ञाग्नि का जो अत्यन्त पवित्र धूम आकाश में चारों ओर फैला उसे चन्द्रमा ने अपनी गोद में समेट लिया । जनता ने उसे चन्द्रबिम्ब के 'अंक' (चिह्न) के नाम से प्रसिद्ध किया ॥६१॥ ते वीतविघ्नं विरचय्य वह्नौ वषट्कृतैः प्रीणनमाप्तविप्राः । समापितं संसदि सप्ततन्तुं प्रदक्षिणीचक्रुरपेतशङ्काः ॥६२॥ सत्यवादी ब्राह्मणों ने निर्विघ्न आहुतियों से अग्निदेव को प्रसन्न करके यज्ञ समाप्त हो जाने पर निःशंक होकर यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा की ॥६२॥ एवं स दाने विविधेऽध्वरे च निविष्टचेता विरतान्यकृत्यः । गतान्यनेकान्यपि वासराणि विशालकीर्ति र्न विदाञ्चकार ॥६३॥ इस प्रकार विविध दान देने में और यज्ञ कराने में चित्त लगाने के कारण महा यशस्वी हम्मीरदेव अन्य सब कार्य भूल गये और अनेक दिन व्यतीत हो जाने का भी उन्हें ध्यान नहीं रहा ॥६३॥ (५९) समित्प्रक्षेपेण वह्निप्रज्वलने या ऋक् प्रयुज्यते सा सामिधेनी।
१२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्ञात्वा रणस्तम्भपुरं तदानीं विप्रोषितस्वामिकमृद्धवैरः । सहाऽश्ववारैरतिदुर्निवारैरलावुदीनस्त्वरितं प्रतस्थे ॥६४॥ उस समय हम्मीरदेव को रणस्तम्भपुर से बाहर गया हुआ जानकर प्रवृद्ध वैर वाला अला- उद्दीन शीघ्र दुर्निवार घुड़सवारों के साथ रणस्तम्भपुर की ओर रवाना हुआ ॥६४॥ पञ्चाशद्भिः सैन्धवानां सहस्रैरग्रस्कन्धे गन्धवाहस्यदानाम् । उलूग्खानः प्राणतुल्यो नृपस्य भ्राता भीमः शात्रवाणाञ्चचाल ॥६५॥ आगे-आगे पचास हज़ार वायु के समान वेग वाले घोड़ों के साथ अलाउद्दीन का प्राणप्रिय भाई उलूगखाँ, जो शत्रुओं के लिये भयंकर था, रवाना हुआ ॥६५॥ हम्मीरदेवनृपतेरपि मन्त्रिमुख्या विद्याभटप्रभृतयः सुचिरं विचार्य । माद्यन्मतङ्गजतुरंगमसङ्कुलानि निन्युः सपत्नपृतनाभिमुखं बलानि ॥६६
एकादशः सर्गः १२५ द्रुततरमतिरौद्रः पारसीकस्य भर्तुः प्रबलबलसमूहः सूचयन् भाव्यनर्थम् । परिधिरिव गरीयान् मण्डलञ्चण्डभानो र्नगरमरमरौत्सोच्चाहुवाणान्वयस्य ॥ म्लेच्छपति अलाउद्दीन के अत्यन्त भयंकर और प्रवल सेनासमूह ने, भावी अनर्थ की सूचना देते हुए, चौहान वंश के हम्मीरदेव के रणस्तम्भपुर नामक नगर को शीघ्र घेर लिया, जिस प्रकार एक बड़ी भारी परिधि सूर्यबिम्ब को घेर लेती है (सूर्य के चारों ओर घेरा सा दिखाई देना अशुभ माना जाता है) ॥७१॥ अवनिः स्वयमीयुषी प्रकम्पं निजभर्तुर्व्यसनागमं समीक्ष्य । जनता यवनेशसैन्यभारे भृशमारोपयति स्म दूषणानि ॥७२॥ स्वयं पृथ्वी भी, अपने स्वामी हम्मीर के भावी व्यसन का विचार करके हिल उठी (भूकम्प आना भी अशुभ माना जाता है) ; लोगों ने व्यर्थ ही में यवनपति की सेना पर यह दोष दिया कि यवनसेना के चलने से पृथ्वी हिल रही है ॥७२॥ निर्घातोग्रस्वानमिश्रः समन्तादुल्कादण्डः प्रादुरासीत् प्रचण्डः । आग्नेयास्त्रं गोलकारावमिश्रं दुर्गान्तस्थैर्द्वेषिणां मन्यते स्म ॥७३॥ चारों ओर भीषण शब्द करता हुआ एक प्रचण्ड तारा आकाश से टूट गिरा (तारा टूटना भी अशुभ माना जाता है) ; किन्तु दुर्ग में रहनेवाले लोगों ने उसे शत्रुओं की विकट ध्वनि के साथ गोले छोड़ने वाले तोप की चमक और गर्जना समझा ॥७३॥ जैत्रात्मजोऽपि जितभीतिरनन्यचेता निर्वर्त्य कृत्यमखिलं विधिनोपनीतम् । श्रुत्वापि दुर्गमुपरुद्धममित्रसैन्यैर्नांतित्वरो निववृते निजपत्तनाय ॥७४॥ जैत्रसिंह के पुत्र निर्भय हम्मीरदेव, अनन्यचित्त से सम्पूर्ण कार्य को विधिपूर्वक समाप्त करवा कर, अपने रणस्तम्भपुर दुर्ग को शत्रुओं की सेना से घिरा हुआ जानकर भी, नगर की ओर बहुत अधिक व्यग्रता से नहीं लौटे ॥७४॥ इति श्री सुर्जनचरितमहाकाव्ये एकादशः सर्गः ।