भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 256 में से

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दशमः सर्गः १११ निर्माय कञ्चित् कपटप्रबन्धमहं करिष्यामि तथाभ्युपायम् । यथा करस्थं तव कार्मुकं स्याच्छरव्यतां याति यथा सपत्नः ॥१५०॥ मैं कुछ न कुछ कपट जाल रचकर ऐसा उपाय करूँगा जिससे आपके हाथ में धनुष-बाण आ जाय और शत्रु निशाना बन जाय ॥१५०॥ इत्थं स निर्णीय समं नृपेण जगाम गोष्ठीं यवनाधिपस्य । दिनैः कियद्भिर्निजविद्ययाऽसावरञ्जयत् तं सह मन्त्रिमुख्यैः ॥१५१॥ राजा से इस प्रकार निर्णय करके चन्दबरदाई यवनपति शहाबुद्दीन की सभा में गए और कुछ दिनों में ही उन्होंने अपनी विद्या के कौशल से मुख्यमंत्रियों के साथ साथ शहाबुद्दीन को प्रसन्न कर लिया ॥१५१॥ अथैकदा चित्रकथाप्रसङ्गे शाहाबुदीसंसदि स प्रगल्भः । कुतूहलाद् भर्तरि सावधाने स्फीतां मुदा वाचमुदाजहार ॥१५२॥ इसके बाद एक दिन शहाबुद्दीन की सभा में जब विचित्रकथा का प्रसंग चल रहा था तब चतुर चारण ने सावधान होकर सुनने वाले शहाबुद्दीन से कुतूहलवश ये प्रसन्न वचन कहे ॥१५२॥ योऽसौ महाराज मृधे निरुध्य विनीतनेत्रो भवता निबद्धः । अयःकटाहान् विशिखेन विध्येदेकेन सोऽतीक्ष्णमुखेन सप्त ॥१५३॥ महाराज ! युद्ध में पकड़ा गया यह पृथ्वीराज, जिसे आपने अन्धा बनाकर कैद कर रखा ह, एक कुंठित बाण से सात लोहे के कड़ाह भेद सकता है ॥१५३॥ इतीरितः कालसमीरितोऽसौ तत्कालमाकारितवीरलोकः । पुराद्बहिः कौतुकदङ्गरभूमिं विशालमञ्चां रचयाञ्चकार ॥१५४॥ यह सुनकर काल से प्रेरित शहाबुद्दीन ने तुरन्त अपने वीर वर्ग को बुलाकर नगर के बाहर विशाल मंच वाली एक क्रीडाशाला बनवाई ॥१५४॥ प्रतन्यमानप्रतिनादभिन्नप्रभिन्नदिग्वारणकर्णरन्ध्रे । निरुन्धति व्योमदह्रीमुदग्रध्वनौ मुदा ताडितदुन्दुभीनाम् ॥१५५॥ समीरणासङ्गततरङ्गिताभिर्लसत्पताकाभिरलङ्कृताग्रे । अयःकटाहेषु निवेशितेषु स्तम्भे समुत्तम्भितहेमकुम्भे ॥१५६॥ सुखोपविष्टेषु यथानिवेशं प्रवीरवर्गेषु कुतूहलेन । आह्वापयामास शहाबुद्दीनः सहाऽवनीन्द्रेण स बन्दिनं तम् ॥१५७॥ जब आनन्दपूर्वक जोरों से बजाए गए नगाड़ों की उग्र ध्वनि दिग्गजों के कर्ण कुहरों को अपनी फैलती हुई प्रतिध्वनि के साथ मानों छिन्न-भिन्न करते हुये आकाश में व्याप्त हो रही थी, और जब सोने के कलश से शोभित तथा अपने ऊपर वायु के संग से फहराती हुई पताका से विलसित खम्भे पर लोहे के कड़ाह रख दिए गए थे तथा जब सब वीर गण अपने अपने स्थानों पर आराम से बैठ गए थे, तब कुतूहल के कारण शहाबुद्दीन ने एक राजा को भेज कर उस कैदी (पृथ्वीराज) को बुलाया ॥१५५-१५७॥ (१५७) अवनीन्द्रेण सह केनचित् राज्ञा सह । वन्दिनं बन्दीकृतं पृथ्वीराजम् ।

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