भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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११२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्वलन्तमन्तर्व्यसनस्य तापाच्छ्वसन्तमुच्चैरनुवेलमुष्णम् । विशीर्णसर्वव्यवसायसत्वं दृष्टं विना दृष्टिविषं यथैकम् ॥१५८॥ प्रतिद्विपास्कन्दनभिन्नदन्तं द्विपं यथा क्षीणमदप्रवाहम् । स्वर्भानुसंभिन्नमिवार्कबिम्बमार्द्रेन्धनेनेव विरूणमग्निम् ॥१५९॥ पकड़े हुये साँप के समान अपमान की भयंकर वेदना के सन्ताप से अन्दर ही अन्दर जलता हुआ, लगातार लम्बी और गरम साँसें लेता हुआ, नेत्रों के बिना जिसकी सब कार्य-प्रवृत्ति सुधबुध हीन हो गई थी ऐसा वह कैदी, प्रतिद्वन्द्वी हाथी के प्रहारों से जिसके दाँत टूट गए हों और पराजय के दुःख से जिसका मद-प्रवाह क्षीण हो गया हो ऐसे हाथी के समान, राहु से ग्रस्त चन्द्रबिम्ब के समान और गीले ईंधन के कारण धुँआ दे-देकर रो-रोकर जलने वाली आग के समान लग रहा था ॥१५८-१५९॥ जयश्रियः कार्मणमन्यवीरैर्दुर्नमनं कार्मुकमस्य पाणौ । निवेशितं पार्श्वचरैः शनैश्च शहाबुदीनस्य तदा निदेशात् ॥१६०॥ अन्य वीरों से न झुकाये जानेवाले तथा जय-लक्ष्मी को प्राप्त करने में कुशल धनुष को शहाबुद्दीन के आदेश से उसके अनुचरों ने पृथ्वीराज के हाथ में दे दिया ॥१६०॥ अनादरारोपितशिञ्जिनीके संयोजिते तत्र शरेण चापे । बन्दी बभाषे बहुलीकृतेन स्वरेण शृण्वत्यधिपे धरित्र्याः ॥१६१॥ जब पृथ्वीराज अनादर से उस धनुष को झुकाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा चुके और उस पर बाण रख चुके तब चारण ने पृथ्वीराज तक सुनाई देने वाले उच्चस्वर से कहा ॥१६१॥ उच्चैर्महाराज यदा निदेशं वारत्रयं श्रोष्यति युष्मदीयम् । शरेण कुण्ठेन धनुर्धरोऽयं लक्ष्यं तदा भेत्स्यति वः समक्षम् ॥१६२॥ महाराज ! उच्च स्वर में दिये गये आपके आदेश को जब यह तीन बार सुन लेगा तब यह धनुर्धर आपके सामने ही कुंठित बाण से निशाना भेद देगा ॥१६२॥ तथेति तस्य प्रहरेति वक्तुं व्यात्ताननस्य क्षततालुमूलः । प्राणैः सहानुङ्करणस्य शत्रोर्जवान् नियन्तुर्निर्याय बाणः ॥१६३॥ तब ज्यों ही शहाबुद्दीन ने "बाण चलाओ" यह कहने के लिए मुँह खोला त्यों ही धनुर्धर पृथ्वी- राज का शब्दवेधी बाण उन्हें अन्धा कर देनेवाले शत्रु के प्राणों को साथ लेकर उसके कण्ठतालु को फोड़ता हुआ वेग से पार निकल गया ॥१६३॥ (