सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५ दशमः सर्गः ११३ निपीतयन् वैरमतीव तीव्रं यशो वितन्वन् विशदं जगत्याम् । फलेन हीनोऽपि महाफलोऽभूत् पृथ्वीपतेस्तस्य तदा पृषत्कः ॥१६४॥ पृथ्वीराज का वह बाण यद्यपि फल (बाण का नोकीला सिरा) से हीन अर्थात् कुंठित था तो भी अत्यन्त उग्र वैर का बदला लेने के कारण और संसार में शुभ्र यश फैलाने के कारण वह महान् फल देने वाला सिद्ध हुआ ॥१६४॥ भयविस्मयशोकसङ्कुलान्तःकरणैर्वीरगणैरलक्ष्यमाणः । अधिरोप्य वनायुजं स बन्दी क्षितिपालं कुरुजाङ्गलं निनाय ॥१६५॥ भय, आश्चर्य और दुःख से व्याकुल चित्त वाले यवन वीरों की नजर बचा कर चन्द वरदाई पृथ्वीराज को अरबी घोड़े पर बैठाकर कुरुजांगल देश ले आये ॥१६५॥ पुण्यक्षेत्रे तत्र सत्क्षत्रियाणां दत्तानन्दे शौर्यशौटीर्यभाजाम् । पृथ्वीलोकं पूरयित्वा यशोभिः पृथ्वीराजः प्रार्थितं प्राप लोकम् ॥१६६॥ शूरवीरों को आनन्द देनेवाले और श्रेष्ठ क्षत्रियों के पुण्यक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, पृथ्वीराज, अपने यश को पृथ्वीलोक में फैलाकर, अपने वांछित लोक (स्वर्ग) को चले गए ॥१६६॥ इति श्री सुर्जनचरितमहाकाव्ये दशमः सर्गः।