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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

११२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्वलन्तमन्तर्व्यसनस्य तापाच्छ्वसन्तमुच्चैरनुवेलमुष्णम् । विशीर्णसर्वव्यवसायसत्वं दृष्टं विना दृष्टिविषं यथैकम् ॥१५८॥ प्रतिद्विपास्कन्दनभिन्नदन्तं द्विपं यथा क्षीणमदप्रवाहम् । स्वर्भानुसंभिन्नमिवार्कबिम्बमार्द्रेन्धनेनेव विरूणमग्निम् ॥१५९॥ पकड़े हुये साँप के समान अपमान की भयंकर वेदना के सन्ताप से अन्दर ही अन्दर जलता हुआ, लगातार लम्बी और गरम साँसें लेता हुआ, नेत्रों के बिना जिसकी सब कार्य-प्रवृत्ति सुधबुध हीन हो गई थी ऐसा वह कैदी, प्रतिद्वन्द्वी हाथी के प्रहारों से जिसके दाँत टूट गए हों और पराजय के दुःख से जिसका मद-प्रवाह क्षीण हो गया हो ऐसे हाथी के समान, राहु से ग्रस्त चन्द्रबिम्ब के समान और गीले ईंधन के कारण धुँआ दे-देकर रो-रोकर जलने वाली आग के समान लग रहा था ॥१५८-१५९॥ जयश्रियः कार्मणमन्यवीरैर्दुर्नमनं कार्मुकमस्य पाणौ । निवेशितं पार्श्वचरैः शनैश्च शहाबुदीनस्य तदा निदेशात् ॥१६०॥ अन्य वीरों से न झुकाये जानेवाले तथा जय-लक्ष्मी को प्राप्त करने में कुशल धनुष को शहाबुद्दीन के आदेश से उसके अनुचरों ने पृथ्वीराज के हाथ में दे दिया ॥१६०॥ अनादरारोपितशिञ्जिनीके संयोजिते तत्र शरेण चापे । बन्दी बभाषे बहुलीकृतेन स्वरेण शृण्वत्यधिपे धरित्र्याः ॥१६१॥ जब पृथ्वीराज अनादर से उस धनुष को झुकाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा चुके और उस पर बाण रख चुके तब चारण ने पृथ्वीराज तक सुनाई देने वाले उच्चस्वर से कहा ॥१६१॥ उच्चैर्महाराज यदा निदेशं वारत्रयं श्रोष्यति युष्मदीयम् । शरेण कुण्ठेन धनुर्धरोऽयं लक्ष्यं तदा भेत्स्यति वः समक्षम् ॥१६२॥ महाराज ! उच्च स्वर में दिये गये आपके आदेश को जब यह तीन बार सुन लेगा तब यह धनुर्धर आपके सामने ही कुंठित बाण से निशाना भेद देगा ॥१६२॥ तथेति तस्य प्रहरेति वक्तुं व्यात्ताननस्य क्षततालुमूलः । प्राणैः सहानुङ्करणस्य शत्रोर्जवान् नियन्तुर्निर्याय बाणः ॥१६३॥ तब ज्यों ही शहाबुद्दीन ने "बाण चलाओ" यह कहने के लिए मुँह खोला त्यों ही धनुर्धर पृथ्वी- राज का शब्दवेधी बाण उन्हें अन्धा कर देनेवाले शत्रु के प्राणों को साथ लेकर उसके कण्ठतालु को फोड़ता हुआ वेग से पार निकल गया ॥१६३॥ (

१५ दशमः सर्गः ११३ निपीतयन् वैरमतीव तीव्रं यशो वितन्वन् विशदं जगत्याम् । फलेन हीनोऽपि महाफलोऽभूत् पृथ्वीपतेस्तस्य तदा पृषत्कः ॥१६४॥ पृथ्वीराज का वह बाण यद्यपि फल (बाण का नोकीला सिरा) से हीन अर्थात् कुंठित था तो भी अत्यन्त उग्र वैर का बदला लेने के कारण और संसार में शुभ्र यश फैलाने के कारण वह महान् फल देने वाला सिद्ध हुआ ॥१६४॥ भयविस्मयशोकसङ्कुलान्तःकरणैर्वीरगणैरलक्ष्यमाणः । अधिरोप्य वनायुजं स बन्दी क्षितिपालं कुरुजाङ्गलं निनाय ॥१६५॥ भय, आश्चर्य और दुःख से व्याकुल चित्त वाले यवन वीरों की नजर बचा कर चन्द वरदाई पृथ्वीराज को अरबी घोड़े पर बैठाकर कुरुजांगल देश ले आये ॥१६५॥ पुण्यक्षेत्रे तत्र सत्क्षत्रियाणां दत्तानन्दे शौर्यशौटीर्यभाजाम् । पृथ्वीलोकं पूरयित्वा यशोभिः पृथ्वीराजः प्रार्थितं प्राप लोकम् ॥१६६॥ शूरवीरों को आनन्द देनेवाले और श्रेष्ठ क्षत्रियों के पुण्यक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, पृथ्वीराज, अपने यश को पृथ्वीलोक में फैलाकर, अपने वांछित लोक (स्वर्ग) को चले गए ॥१६६॥ इति श्री सुर्जनचरितमहाकाव्ये दशमः सर्गः।

एकादशः सर्गः तस्मिन् गते पुण्यकृतां प्रयाते प्रह्लादनामा तनयस्तदीयः । प्रह्लादयन् मानसमानतानां समुद्रकाञ्चीं सुमनाः शशास ॥ १ ॥ पृथ्वीराज के पुण्यात्मा पुरुषों की गति (स्वर्गलोक) प्राप्त करने पर उनके पुत्र प्रह्लाद, विनीत जनों के मनों को आह्लाद देते हुए, समुद्ररशना पृथ्वी पर शासन करने लगे ॥ १ ॥ नितान्तभक्त्या भगवत्युपेन्द्रे सत्वप्रधानैश्च गुणैरगण्यैः । मनीषिणोऽमंसत मर्त्यमूर्ति प्रह्लादमेव क्षितिपालमेनम् ॥ २ ॥ असंख्य सत्वगुण प्रधान गुणों से और भगवान् विष्णु में आत्यन्तिक भक्ति होने से राजा प्रह्लाद को बुद्धिमान् लोग मनुष्य-शरीरधारी प्रह्लाद ही मानते थे ॥ २ ॥ गोविन्दराजं रजसोज्झितात्मा तनूजमात्मीयपदेऽभिषिच्य । यशोवदातैः सुकृतैरुपार्त्तैः पौरन्दरे धाम्नि स निर्ववार ॥ ३ ॥ रजोगुण से विमुक्त मनवाले प्रह्लाद ने, राज्य-

एकादशः सर्गः ११५ आयोधनेष्वेव धनञ्जयाद्या विश्राणनेष्वेव दधीचिमुख्याः । धर्मात्मजाद्याः खलु धर्ममात्रे सर्वत्र वीरः स तु भूरिसत्त्वः ॥८॥ अर्जुन आदि केवल युद्धवीर थे। दधीचि आदि केवल दानवीर थे। युधिष्ठिर आदि केवल धर्मवीर थे। किन्तु महान् पराक्रमी हम्मीरदेव एक साथ युद्धवीर, दानवीर और धर्मवीर थे ॥८॥ चित्रैश्चरित्रैः प्रथितस्य यस्य सम्भावितस्यापि विशालशीलैः । गुणोच्चयं वर्णयतां कवीनां वाणी न सत्यव्रतमुज्झति स्म ॥९॥ (प्रायः कवियों के वर्णन में थोड़ी बहुत अत्युक्ति होती ही है, किन्तु) नाना प्रकार के श्लाघ्य चरित्रों के कारण विख्यात और विशाल शील वाले तथा महापुरुषों द्वारा भी सम्मानित हम्मीरदेव क गुण-समूह का वर्णन करने वाले कवियों की वाणी सत्यव्रत को जरा भी नहीं छोड़ती ॥९॥ आश्चर्यमस्याऽवनिनायकस्य ज्वलत्प्रतापज्वलनोऽनुवेलम् । विपक्षनारीनयनाम्बुपूरैः प्रपूर्यमाणः परिव

११६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् समुद्रनेमिं स विजित्य वीरः कृत्वाऽवनीशान् करदान् क्रमेण । उपाद्रवद् वाजिबलेन दृप्यद्वरूथिनीकांस्तरसा तुरुष्कान् ॥१५॥ वीर हम्मीरदेव ने समुद्र-रशना पृथ्वी को जीतकर क्रमशः राजाओं को कर देनेवाला बनाया और अपनी अश्व-सेना द्वारा गर्वयुक्त सेना वाले यवनों को वेग से खदेड़ भगाया ॥१५॥ शकान् निराकृत्य बकानुकारान् स्वपौरुषेणैव स राजहंसः । पद्माकरं शीलितसाधुचक्रं सुखेन दिल्लीनगरं जगाहे ॥१६॥ जिस प्रकार राजहंस बगुलों को भगा कर साधु पुरुषों द्वारा सेवित तथा कमलों से सुशोभित सरोवर में विहार करता है, उसी प्रकार हम्मीर रूपी राजहंस ने अपने पराक्रम से यवन-रूपी बगुलों को भगा कर साधु पुरुषों के समूह से सेवित और लक्ष्मी से सुशोभित दिल्ली नगर पर अधि- कार कर लिया ॥१६॥ सैन्यानि विद्राव्य स यावनानि दूरन्तमांसीव समुद्ध

एकादशः सर्गः ११७ उसी प्रकार सूर्य भी दिन पर प्रजा को अपने करों (किरणों) का सहारा देकर सायंकाल करों को समेट लेते थे। अतः सूर्य हम्मीर के प्रतिद्वन्द्वी हुए। इसलिये हम्मीर के प्रताप ने मित्र (सूर्य) को प्रतिपक्षी होने के कारण शत्रु के समान अपने गुणों (रस्सों) से बाँध लिया अर्थात् हम्मीर के प्रताप के आगे सूर्य भी फीका पड़ गया) ॥२०॥ समाप्तकृत्यः प्रशमादरोणां नृपः स्वपुर्यामनयन् नयज्ञः । कालं कियन्तं किल यन्त्रितोऽसौ समुत्सुकानां प्रणयात् प्रियाणाम् ॥२१॥ शत्रुओं का दमन कर देने के कारण कार्य से निवृत्त नीति-कुशल राजा ने, अत्यन्त उत्सुक प्रियाओं के प्रेम-बन्धन के कारण, कुछ समय अपनी नगरी में बिताया ॥२१॥ पुरो हितेन स्वपुरोहितेन पुरस्कृतैर्भूमिमुरैः परीतः । नृपः प्रतस्थे सहपट्टराज्ञ्या स पट्टनाख्यं पुटभेदनं तत् ॥२२॥ सदा हित करने वाले राजपुरोहित जिनके प्रमुख थे ऐसे ब्राह्मणों से घिरे हुए राजा हम्मीरदेव ने अपनी पटरानी के साथ पट्टन (केशवराय पाटन) नामक नगर की ओर प्रस्थान किया ॥२२॥ ययुश्च तस्यानुपदं सदस्याः सदोशितुश्चित्तविदो वयस्याः । मन्त्रप्रधानाः सचिवास्तथान्ये नियोजिताः कोशगृहाधिकारे ॥२३॥ उनके पीछे-पीछे सभासद, श्रेष्ठ स्वामी की चित्तवृत्ति को जाननेवाले मित्र, मन्त्रकुशल मन्त्रीगण और कोषाधिकारीगण चले ॥२३॥ निरामया नीरधितोरजाताः समोरिता वल्लभपालमुख्यैः । जग्मुर्युवानः शतशो विनीता जवेन वाहा जितवैनतेयाः ॥२४॥ समुद्रतट पर उत्पन्न होने वाले और अपने वेग से गरुड़ को भी जीतनेवाले सैकड़ों जवान और निरोगी घोड़े अपने प्रिय सक्टरों से प्रेरित होकर विनयपूर्वक चले ॥२४॥ उत्तुङ्गतप्ताजितशैलशृङ्गं मातङ्गसैन्यं शनकैः प्रतस्थे । कलिङ्गराजेन कलिप्रशान्त्यै बलीयसोऽमुष्य बलीकृतं यत् ॥२५॥ अपनी ऊँचाई से पर्वतों के शिखरों को मात करनेवाली हाथियों की सेना, जिसे कलिंग देश के राजा ने कलह (युद्ध) की शान्ति (सन्धि) के लिए बलवान् हम्मीरदेव को भेंट किया था, धीरे-धीरे चली ॥२५॥ अथापतत् पत्रिरजवैः स वाहैस्तीरं तिलद्रोणितरङ्गवत्याः । तरङ्गसङ्गत्वरगन्धवाहस्निग्धीकृतच्छायतमालमालम् ॥२६॥ पक्षियों के समान वेग से हवा में उड़ने वाले घोड़ों से युक्त राजा हम्मीरदेव तिलद्रोणि (दूणी) नदी के, लहरों का आलिंगन करने वाले वायु के कारण स्निग्धच्छाया वाले तमाल वृक्षों की पंक्ति से शोभित तीर पर पहुँचे ॥२६॥ (२५) कलिः कलहः । बलीकृतमुपहारीकृतम् ।

११८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् नदीं तिलद्रोणिमदीनसत्वः स तां जगाहे गहनप्रवाहाम् । यस्याः स्पृशन् पावनमम्बुबिन्दुं पापोऽपि तापत्रितयं जहाति ॥२७॥ पराक्रमी राजा ने गहरे प्रवाह वाली तिलद्रोणि नदी में स्नान किया, जिस नदी के पवित्र जलबिन्दु का स्पर्श करके पापी भी त्रिविध ताप (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) से मुक्त हो जाता है ॥२७॥ स्फुरन्महानीलमणीमनोज्ञं कदम्बमालाकलितोपकण्ठम् । सुपर्णसम्पादितसौम्यपादच्छायं मयूरच्छदचित्रमौलिम् ॥२८॥ उपात्तरत्नैः कटकैरशून्यं पीताम्बरोत्तङ्गकलेवराढ्यम् । मुखानिलापूरितवेणुरन्ध्रनिनादसंमोहितवन्यरामम् ॥२९॥ श्रियं दधानं भृगुपादजानां हिरण्यगर्भं दधतं तथान्तः । विलोकयामास स पारियात्रं गिरि मुरारातिमिवाऽवनीशः ॥३०॥ देदीप्यमान नीलम मणियों से मनोहर अथवा देदीप्यमान नीलमणि के समान श्याम कान्ति से शोभित ('नीलमणि' भगवान् कृष्ण का नाम भी है), कदम्बमाला से शोभित कण्ठ वाले, अपने वाहन गरुड़ में प्रतिबिम्बित सुन्दर पैरों की कान्ति वाले, मयूरपंख की शोभा को मस्तक पर धारण करने वाले, हाथों में रत्नजड़ित कड़े पहनने वाले, उन्नत शरीर में पीताम्बर (पीला रेशमी वस्त्र) धारण करने वाले, मुख की वायु से बजाई गई मुरली के छेदों से निकलनेवाली ध्वनि से गोपियों का मन मोहित करने वाले, महर्षि भृगु के पादप्रहार जन्य चिह्न को लक्ष्मी के समान वक्षःस्थल पर धारण करने वाले और हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को अपने नाभि-कमल के अन्दर धारण करने वाले भगवान् कृष्ण के समान, देदीप्यमान नीलम मणियों से मनोहर, कदम्ब वृक्षों की पंक्ति से शोभित उपत्यका वाले, सुन्दर पत्तों वाले वृक्षों की घनी छाया से शोभित, अपने शिखर पर नाचने वाले मयूरों के रंग-बिरंगों पंखों से सुन्दर, रत्नों की खान वाले मध्यभाग से युक्त, उच्च शिखरों पर छाये हुए पीले आकाश से शोभित, गुफाओं से निकलने वाले वायु से बजाये गये बाँसों के छेदों से निकलने वाली ध्वनि से वन की स्त्रियों को मोहित करने वाले, तटहीन प्रताप के पास उगने वाले वृक्षों की शोभा को धारण करने वाले और अपने गर्भ में सोने की खान को धारण करने वाले पारियात्र (अरावली) पर्वत को हम्मीरदेव ने देखा ॥२८-३०॥ सात्राजितीसौहृदभङ्गभीरोः प्राक् पारिजातं हरतो मुरारेः । पुलोमजावर्धितमत्सरेण वृत्रद्विषा यत्र रणः प्रवृत्तः ॥३१॥ प्राचीन काल में, सत्राजित् की पुत्री सत्यभामा के प्रणयभंग के भय से, स्वर्ग से पारिजात हर लाने वाले भगवान् कृष्ण से, अपनी पत्नी शची द्वारा बढ़ाये गये क्रोध वाले इन्द्र ने इस पारि- यात्र पर्वत पर युद्ध छेड़ा था ॥३१॥ (२८) सुपर्णानि सुन्दराणि वृक्षपत्राणि । सुपर्णः गरुत्मान् । (२९) कटकं कराभरणमद्रिनितम्बश्च । अम्बरमाकाशं वस्त्रञ्च । (३०) भृगुः महर्षिभृगुः अतटप्रपातश्च । (३१) सात्राजिती सत्राजितस्य कन्या कृष्णपत्नी सत्यभामा ।

एकादशः सर्गः १११ तार्क्ष्यस्य पक्षातिरयात् पतिष्णोः सुरेन्द्रनागस्य शरीरभारात् । अवाप्तभङ्गानि यदस्य शृङ्गाण्यतोऽरुणन्नाहणवर्त्म शैलः ॥३२॥ झपटने वाले गरुड़ के पंखों के वेग से और इन्द्र के ऐरावत हाथी के शरीर के बोझ से इस पारियात्र पर्वत के शिखर टूट गये थे, यही कारण था कि इस पर्वत ने सूर्य के मार्ग को नहीं रोका ॥३२॥ हृत्वा यशोभिः सह वृत्रशत्रोः सुरद्रुमालीं सुरभिं सभार्यः । यस्मिन् विशश्राम भवश्रमार्तविश्रामभूमिर्भगवान् मुकुन्दः ॥३३॥ वृत्रशत्रु इन्द्र के यश के साथ-साथ उसके सुगन्धित पारिजात वृक्ष को हर कर, सत्यभामा के साथ भगवान् कृष्ण ने, जो स्वयं मुकुन्द (मोक्षदाता) होने के कारण संसारदुःख से पीड़ित मनुष्यों की विश्रामभूमि हैं, इस पारियात्र पर्वत पर विश्राम किया था ॥३३॥ स भूभृतं भूमिभृतां वरीयान् निषेवितं नाकसदां निकायैः । बभ्राम बिभ्राणमनल्पतीव्रतपोजुषां पावनपर्णशालाः ॥३४॥ राजाओं में श्रेष्ठ हम्मीरदेव, देव-वृन्दों से सेवित तथा उग्र तप करने वाले ऋषियों की पवित्र पर्णकुटियों को धारण करने वाले उस पारियात्र पर्वत पर घूमे ॥३४॥ तस्यान्तरे शान्तरजाः स राजा सुदुर्भालोकनमन्यलोकैः । व्यलोकयद् बिल्वपलाशमूले बिल्वेश्वरं वल्लभमीश्वरायाः ॥३५॥ तत्पश्चात् रजोगुण को जीतने वाले राजा हम्मीर ने, अन्य पुरुषों के लिये दुर्लभ-दर्शन पार्वती- प्रिय बिल्वेश्वर महादेव के, जो एक विल्ववृक्ष की जड़ के पास, विराजमान थे, दर्शन किये ॥३५॥ विडौजसं वीर्यवता विजित्य महं महीध्रस्य महामहिम्नः । विधित्समानेन सनातनेन यः स्थापितः पावितविश्वलोकः ॥३६॥ महा बलवान् सनातन पुरुष भगवान् कृष्ण ने , इन्द्र को जीत कर, विजयोत्सव द्वारा महान् महिमा वाले पारियात्र पर्वत का गौरव बढ़ाने के निमित्त, विश्व को पवित्र करने वाले बिल्वेश्वर महादेव को वहाँ स्थापित किया था ॥३६॥ विधाय भक्त्या विधिवत् सपर्यां प्रजेश्वरः पञ्चमुखस्य तस्य । वितीर्य तीर्थोचितभूरिदानमानन्दयद् ब्राह्मणवर्गमग्र्यम् ॥३७॥ राजा हम्मीरदेव ने उन बिल्वेश्वर महादेव की भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा की और तीर्थो- चित विपुल दान देकर प्रथमवर्ण ब्राह्मण-वर्ग को आनन्दित किया ॥३७॥ ततः पुरं षट्पुरनामधेयमध्यास्त विध्वस्ततमोविकारः । यदाश्रयाद् बुद्धिभृतां नराणां षड्वैरिणो न स्वपुरं विशन्ति ॥३८॥ तत्पश्चात् अपने तमोगुण (और अज्ञान) के विकार को नष्ट कर देने वाले हम्मीरदेव षट्पुर (खटकड़) नामक नगर में पहुँचे जहाँ रहने वाले बुद्धिमान् पुरुषों के शरीर में षड् वैरी (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य रूपी छ शत्रु) प्रवेश नहीं कर पाते ॥३८॥

१२० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् स पट्टनाख्यं नगरं पटीयः फलप्रकर्षे विहितक्रियाणाम् । अलञ्चकाराशु हृतान्तरायः सुनीतिवर्त्मैव मनःप्रसादः ॥३९॥ जिस प्रकार (सत्वगुण जन्य) मनःप्रसाद विघ्नों को दूर करके सुनीतिमार्ग को अलंकृत करता है, उसी प्रकार विघ्नों को दूर करने वाले एवं सत्वगुणसम्पन्न राजा हम्मीर ने विहित कर्मों का उत्तम फल देने में निपुण पट्टन (केशवराय पाटन) नामक नगर को शीघ्र ही अलंकृत किया ॥३९॥ सुराङ्गनावर्जितपारिजातप्रसूनपर्याप्ततरङ्गशोभा । चर्मण्वती शर्ममयप्रवेणी प्रवीणयामास यशांसि यस्य ॥४०॥ (स्नान करने के लिये आई हुई) स्वर्ग की देवियों द्वारा लाये गये पारिजात पुष्पों से जिसकी लहरों की शोभा बढ़ रही है ऐसी मंगलमय प्रवाह वाली चर्मण्वती (चम्बल) नदी हम्मीरदेव के यश को अपने कल-कल शब्दों द्वारा मानों वीणा बजा कर गाया करती है ॥४०॥ चर्मण्वतीवारिणि धर्मपत्न्या समं समाप्याऽभिषवं स वीरः । संसिद्धिदात्रीं विमलोपचारैरानर्च मृत्युञ्जयमञ्जुमूर्तिम् ॥४१॥ वीर हम्मीर ने अपनी धर्मपत्नी के साथ चर्मण्वती के जल में स्नान करके उत्तम सिद्धि देने वाली मृत्युंजय महादेव की सुन्दर मूर्ति की शुद्ध उपचारों से पूजा की ॥४१॥ भासामथो भर्तरि सोपरागे विश्राणनेषु प्रथितानुरागः । अन्यैरतुल्योऽपि तुलामुदारः सधर्मदारः सुखमारुरोह ॥४२॥ उस समय सूर्यग्रहण होने पर, दान देने में अत्यन्त अनुरागी उदार हम्मीरदेव, अन्य-पुरुषों से अतुलनीय होने पर भी, अपनी धर्मपत्नी के साथ सुख से तुला पर चढ़े ॥४२॥ स्वच्छत्वसाद्गुण्यसुवृत्तताभिर्मुक्तामणीनां गुरुवंशजानाम् । साम्यं समीचीनमनेन तावत् परन्तु नाऽसौ नृपतिः सरन्ध्रः ॥४३॥ स्वच्छता, सद्गुणता (मोती उत्तम गुण अर्थात् सूत्र में पिरोये जाते हैं; हम्मीर में उत्तम गुण थे), सुवृत्तता (मोतियों में सुन्दर गोलाई होती है; हम्मीर में सच्चरित्रता थी) आदि के कारण उत्तम वंश में उत्पन्न होने वाले मोतियों में (जो तुला के दूसरे पलड़े में चढ़ाये गये थे) और उत्तम वंश में उत्पन्न हम्मीरदेव में तुलना के लिये समानता उचित थी, किन्तु केवल एक अन्तर था—वह यह कि मोती 'सरन्ध्र' (छेद वाले) थे और हम्मीर के राज्य में कोई 'रन्ध्र' (छेद या कमी) नहीं था ॥४३॥ कामं महार्घैरपि गौरवाढ्यैर्वज्रैः समग्रा तुलना न राज्ञः । स केवलं वैरिणि वज्रतुल्यो मित्रेऽतिमात्रं मृदुलस्वभावः ॥४४॥ (तुला के दूसरे पलड़े पर जो हीरे चढ़ाये गये थे उन) बहुमूल्य और भारी वज्रों (हीरों) में और अमूल्य एवं गौरवान्वित हम्मीर में सम्पूर्ण समानता नहीं थी क्योंकि हम्मीर केवल शत्रुओं के लिये ही वज्रतुल्य थे, किन्तु मित्रों के लिये अत्यन्त कोमल थे ॥४४॥ (४२) उपरागो ग्रहणम् । (४४) वज्रमिन्द्रायुधं हीरकञ्च ।

१६ एकादशः सर्गः १२१ आरोप्यमाणानि तुलां धनानि यथा यथा वृद्धिमवापुरस्य । तथा तथा चेतसि वैदिकानां मनोरथा नैव समुद्दिजानाम् ॥४५॥ तुला के दूसरे पलड़े पर चढ़ाये जाने वाले हीरे, मोती, सुवर्ण आदि धन जैसे-जैसे बढ़ते गये वैसे-वैसे ही वैदिक कर्मकाण्डी ब्राह्मणों के चित्तों में बढ़ने वाले मनोरथ नहीं समाये ॥४५॥ विश्वम्भरोऽस्मिन् निवसन्रजस्रं देहेऽपि तावद् गुरुतां निधत्ताम् । भूयिष्ठमित्थं मिलिताः सभायामाशासते स्म क्षितिदेवमुख्याः ॥४६॥ सभा में एकत्रित अनेक ब्राह्मण-श्रेष्ठ यह प्रार्थना कर रहे थे कि विश्वंभर भगवान् विष्णु जो राजा में निरन्तर निवास करते हैं कृपया इनके शरीर को भी भारी बना दें। (राजा को भगवान् का अंश माना गया है। अथवा हम्मीर भगवान् के भक्त थे अतः वे निरन्तर उनके हृदय में निवास करते थे) ॥४६॥ स स्थूललक्षः सुमनास्तदानीं स्थूलं वपुः स्वं बहुमन्यते स्म । व्यायामलीलाविभवान् निकामं कुक्षिं कृशं केवलमन्वशोचत् ॥४७॥ दानवीर महात्मा हम्मीर ने उस समय अपने स्थूल शरीर को बहुत अच्छा माना । केवल व्यायाम करने के कारण पतली कमर के लिये ही उन्हें सोच हुआ ॥४७॥ उच्चैस्तरोऽभून् नृपतिस्तदानीं भरातिनम्रात् किल रत्नराशेः । तत्त्वादृगुच्चैःशिरसां जनानामुच्चैःपदारोहणमेव युक्तम् ॥४८॥ उस समय तुला के दूसरे पलड़े के, रत्नसमूह के भार के कारण, नीचे हो जाने से राजा हम्मीर ऊँचे उठ गये । उन जैसे उन्नत शिर वाले महापुरुषों के लिये उच्च पद प्राप्त करना ठीक ही था॥४८॥ नीता नितम्बस्तनभारभाजा मुदं कृशेनापि शरीरकेण । आरोपितास्तत्र तुलां सुरत्नैर्न्या महिष्योऽपि महीश्वरेण ॥४९॥ राजा हम्मीर ने, कृश शरीर होने पर भी नितम्ब और स्तनों के भार के कारण प्रसन्न होने वाली अन्य रानियों को भी उत्तम रत्नों से तुलवाया ॥४९॥ रत्नानि यत्नेन तुलाधृतानि कुलागतेभ्यः प्रथमं द्विजेभ्यः । विभज्य सम्प्राप्तवतो दिगन्तात् सम्भावयामास यथार्हमन्यान् ॥५०॥ तुलादान के उन रत्नों को (एवं मोती, स्वर्ण आदि को) बाँट कर राजा ने पहले कुलपर- म्परागत ब्राह्मणों का और फिर अन्य देशों से आये हुये ब्राह्मणों का यथोचित संत्कार किया ॥५०॥ शुभौ वसूनामधिपौ तदानीं तुलारूढौ तरणिर्नृपश्च । सङ्कोचयामास करं तमोन्धः पूर्वस्तयोर्मुक्तकरः परोऽभूत् ॥५१॥ उस समय वसु (आदित्य देवता; धन) के स्वामी एवं कल्याणकारी, सूर्य और राजा हम्मीर ये दोनों ही तुला (तुलाराशि ; तराजू) पर अधिरूढ़ हुये । उनमें से प्रथम ने (सूर्य ने) तम (राहु) (४७) स्थूललक्षः दानशौण्डः । (५१) वसूनां देवानां धनानाञ्च । तुलायां तुलाराशौ तुलायाञ्च । तमोऽन्धस्तमसा राहुणा अन्धो ग्रस्तः।

१२२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् से अन्ध (ग्रस्त) होकर (अज्ञानान्ध तामसी कंजूस की तरह) अपने करों (किरणों; हाथों) को खींच लिया, किन्तु दूसरे ने (हम्मीर ने) मुक्तकर होकर (हाथ खोलकर) दान दिया (अथवा कर माफ़ कर दिया) ॥५१॥ हम्मीरदेवेन वितीर्यमाणाः पयः सुरभ्यः करिणो मदाम्भः । यत् तत्त्यजुस्तेन सरित्समूहः शरत्कृतं कार्श्यमपोहति स्म ॥५२॥ हम्मीरदेव द्वारा दान दी गई गायों से और दान दिये गये हाथियों से, क्रमशः जो दूध की और मद-जल की धारायें बहीं उनके कारण नदियों की, शरद्-ऋतु में होने वाली जल की कमी, दूर हो गई ॥५२॥ उपप्लवोऽभूत् स कृतोपकारः कुर्वन् शरीरावरणं खरांशोः । तुरङ्गदानावसरे न यस्मात् सस्मार देवोऽयममुष्यरथ्यान् ॥५३॥ ग्रहण के समय राहु ने सूर्यबिम्ब को ढक लिया था, किन्तु सूर्य ने इसे अपना उपकार समझा क्योंकि इस आवरण के कारण घोड़ों के दान के समय हम्मीरदेव को सूर्य के घोड़े याद नहीं आये ॥५३॥ गजाधिपाः केऽपि हयाधिपत्यमन्ये गता भूपतयः परे च । किमन्यदस्मिन् वितरत्यभीक्ष्णं वित्तेशतां विप्रगणाः प्रपन्नाः ॥५४॥ हम्मीर देव के निरन्तर दान देते रहने के कारण कोई गजपति, कोई अश्वपति और कोई भूपति बन गये; अधिक क्या कहें, विप्र लोग भी वित्तेश (कुबेर) बन गये ॥५४॥ मुक्ताकलापे पतिता द्विजानां प्रसूनदामभ्रमतो द्विरेफाः । विलेपनामोदविलीनचित्ता नोत्पेतुरुच्चैरपि वार्यमाणाः ॥५५॥ ब्राह्मणों के मोतियों के हार पर पुष्पमाला के भ्रम से भ्रमर टूट पड़े और चन्दन के तिलक की सुगन्ध से मस्त होकर जोरों से हटाने पर भी नहीं हटे ॥५५॥ कस्यापि कुत्रापि कदाचिदेव याल्पं प्रसूते स्म वसु प्रसन्ना । वनीयकानामवनिस्तदानीं सा रत्नसूः सर्वत एव जाता ॥५६॥ जो भूमि प्रसन्न होने पर किसी किसी के लिये कहीं-कहीं कभी-कभी थोड़ा सा धन उत्पन्न करती है वह भूमि उस समय याचकों के लिये भी सदा और सर्वत्र रत्नों को उत्पन्न करने लगी ॥५६॥ अशेषदानानि स दीनबन्धुरशेषयित्वा स्वयमेव विज्ञः । न्यवेदयद् वेदविदोऽवदातानुपक्रमायाऽद्भुतसप्ततन्तोः ॥५७॥ बुद्धिमान् और दीनवत्सल हम्मीरदेव ने, जब सब प्रकार के दान दिये जा चुके तब वेदज्ञ और पुण्यात्मा ब्राह्मणों से अद्भुत यज्ञ का आयोजन करने की प्रार्थना की ॥५७॥ (५३) उपप्लवो ग्रहणम् ।

एकादशः सर्गः १२३ कुण्डान्यखण्डानि समेखलानि समानि सम्यग् विरचय्य विप्राः । आरेभिरे कोटिमखं कृतज्ञा मुहूर्तमासाद्य मनोऽनुकूलम् ॥५८॥ वेदविधि में निपुण ब्राह्मणों ने अपने मन के अनुकूल शुभ मुहूर्त में अखण्ड, बराबर और मेखला युक्त यज्ञ-कुण्ड बनाकर कोटियज्ञ (वह यज्ञ जिसमें एक करोड़ आहुतियाँ दी जाती हैं) प्रारम्भ किया ॥५८॥ विशुद्धवर्णोज्वलसामिधेनीसंस्कारमासाद्य समेधमानः । समिद्भिराज्यैरपि हूयमानः स सप्तजिह्वोऽपि सहस्रजिह्वः ॥५९॥ वेद की विशुद्ध वर्णों से उज्ज्वल 'सामिधेनी' नामक ऋचाओं से (वे ऋचायें जिनका पाठ करके समिधाओं की आहुतियाँ दी जाती हैं) संस्कृत होकर समिधाओं के हवन से प्रवृद्ध एवं हव्य पदार्थ और घृत की आहुतियों से प्रज्वलित यज्ञ के अग्निदेव 'सप्तजिह्व' कहलाने पर भी 'सहस्र- जिह्व' होकर (सहस्र ज्वालाओं के साथ) प्रकट हुए ॥५९॥ विशुद्धमन्त्रेरितहव्यगन्धं घ्राणोपयुक्तं हरितां दधानः । वितानवैश्वानरगन्धवाहः सुधाभुजां संसदमाचकर्ष ॥६०॥ विशुद्ध वेदमन्त्रों द्वारा यज्ञाग्नि में हवन किये गये हव्य की दिशाओं की नासिका को अत्यन्त प्रिय लगनेवाली सुगन्ध को धारण करने वाला यज्ञाग्नि का हव्यगन्धित वायु देवताओं की सभा को (आहुतियाँ ग्रहण करने के लिये) खींच लाया ॥६०॥ तस्मिन् मखे मेध्यतमोऽन्तरिक्षे समन्ततो यः समियाय धूमः । तमङ्कपालोकृतमिन्दुनाङ्कनाम्ना प्रसिद्धिं जनता निनाय ॥६१॥ उस यज्ञ में यज्ञाग्नि का जो अत्यन्त पवित्र धूम आकाश में चारों ओर फैला उसे चन्द्रमा ने अपनी गोद में समेट लिया । जनता ने उसे चन्द्रबिम्ब के 'अंक' (चिह्न) के नाम से प्रसिद्ध किया ॥६१॥ ते वीतविघ्नं विरचय्य वह्नौ वषट्कृतैः प्रीणनमाप्तविप्राः । समापितं संसदि सप्ततन्तुं प्रदक्षिणीचक्रुरपेतशङ्काः ॥६२॥ सत्यवादी ब्राह्मणों ने निर्विघ्न आहुतियों से अग्निदेव को प्रसन्न करके यज्ञ समाप्त हो जाने पर निःशंक होकर यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा की ॥६२॥ एवं स दाने विविधेऽध्वरे च निविष्टचेता विरतान्यकृत्यः । गतान्यनेकान्यपि वासराणि विशालकीर्ति र्न विदाञ्चकार ॥६३॥ इस प्रकार विविध दान देने में और यज्ञ कराने में चित्त लगाने के कारण महा यशस्वी हम्मीरदेव अन्य सब कार्य भूल गये और अनेक दिन व्यतीत हो जाने का भी उन्हें ध्यान नहीं रहा ॥६३॥ (५९) समित्प्रक्षेपेण वह्निप्रज्वलने या ऋक् प्रयुज्यते सा सामिधेनी।

१२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्ञात्वा रणस्तम्भपुरं तदानीं विप्रोषितस्वामिकमृद्धवैरः । सहाऽश्ववारैरतिदुर्निवारैरलावुदीनस्त्वरितं प्रतस्थे ॥६४॥ उस समय हम्मीरदेव को रणस्तम्भपुर से बाहर गया हुआ जानकर प्रवृद्ध वैर वाला अला- उद्दीन शीघ्र दुर्निवार घुड़सवारों के साथ रणस्तम्भपुर की ओर रवाना हुआ ॥६४॥ पञ्चाशद्भिः सैन्धवानां सहस्रैरग्रस्कन्धे गन्धवाहस्यदानाम् । उलूग्खानः प्राणतुल्यो नृपस्य भ्राता भीमः शात्रवाणाञ्चचाल ॥६५॥ आगे-आगे पचास हज़ार वायु के समान वेग वाले घोड़ों के साथ अलाउद्दीन का प्राणप्रिय भाई उलूगखाँ, जो शत्रुओं के लिये भयंकर था, रवाना हुआ ॥६५॥ हम्मीरदेवनृपतेरपि मन्त्रिमुख्या विद्याभटप्रभृतयः सुचिरं विचार्य । माद्यन्मतङ्गजतुरंगमसङ्कुलानि निन्युः सपत्नपृतनाभिमुखं बलानि ॥६६

एकादशः सर्गः १२५ द्रुततरमतिरौद्रः पारसीकस्य भर्तुः प्रबलबलसमूहः सूचयन् भाव्यनर्थम् । परिधिरिव गरीयान् मण्डलञ्चण्डभानो र्नगरमरमरौत्सोच्चाहुवाणान्वयस्य ॥ म्लेच्छपति अलाउद्दीन के अत्यन्त भयंकर और प्रवल सेनासमूह ने, भावी अनर्थ की सूचना देते हुए, चौहान वंश के हम्मीरदेव के रणस्तम्भपुर नामक नगर को शीघ्र घेर लिया, जिस प्रकार एक बड़ी भारी परिधि सूर्यबिम्ब को घेर लेती है (सूर्य के चारों ओर घेरा सा दिखाई देना अशुभ माना जाता है) ॥७१॥ अवनिः स्वयमीयुषी प्रकम्पं निजभर्तुर्व्यसनागमं समीक्ष्य । जनता यवनेशसैन्यभारे भृशमारोपयति स्म दूषणानि ॥७२॥ स्वयं पृथ्वी भी, अपने स्वामी हम्मीर के भावी व्यसन का विचार करके हिल उठी (भूकम्प आना भी अशुभ माना जाता है) ; लोगों ने व्यर्थ ही में यवनपति की सेना पर यह दोष दिया कि यवनसेना के चलने से पृथ्वी हिल रही है ॥७२॥ निर्घातोग्रस्वानमिश्रः समन्तादुल्कादण्डः प्रादुरासीत् प्रचण्डः । आग्नेयास्त्रं गोलकारावमिश्रं दुर्गान्तस्थैर्द्वेषिणां मन्यते स्म ॥७३॥ चारों ओर भीषण शब्द करता हुआ एक प्रचण्ड तारा आकाश से टूट गिरा (तारा टूटना भी अशुभ माना जाता है) ; किन्तु दुर्ग में रहनेवाले लोगों ने उसे शत्रुओं की विकट ध्वनि के साथ गोले छोड़ने वाले तोप की चमक और गर्जना समझा ॥७३॥ जैत्रात्मजोऽपि जितभीतिरनन्यचेता निर्वर्त्य कृत्यमखिलं विधिनोपनीतम् । श्रुत्वापि दुर्गमुपरुद्धममित्रसैन्यैर्नांतित्वरो निववृते निजपत्तनाय ॥७४॥ जैत्रसिंह के पुत्र निर्भय हम्मीरदेव, अनन्यचित्त से सम्पूर्ण कार्य को विधिपूर्वक समाप्त करवा कर, अपने रणस्तम्भपुर दुर्ग को शत्रुओं की सेना से घिरा हुआ जानकर भी, नगर की ओर बहुत अधिक व्यग्रता से नहीं लौटे ॥७४॥ इति श्री सुर्जनचरितमहाकाव्ये एकादशः सर्गः ।

द्वादशः सर्गः अथ वीक्ष्य पुरं परोपरुद्धं कुलभूपालपरम्परोपनीतम् । न जहौ निजमाननप्रसादं विमनाः सन्नपि मानवाधिनाथः ॥ १ ॥ इसके बाद, कुल-परम्परागत रणस्तम्भपुर को शत्रुओं से घिरा हुआ देखकर राजा हम्मीर- देव ने, दुःखी होकर भी, अपने मुख की प्रसन्नमुद्रा को नहीं छोड़ा ॥ १ ॥ अनुगृह्य वचोऽमृतेन पौरान् भृशमार्तानपि मर्त्यलोकभर्ता । स चिरात् सचिवैरुपास्यमानः समये संसद्माससाद शस्ते ॥ २ ॥ मर्त्यलोक के राजा हम्मीर ने अत्यन्त पीड़ित पुरवासियों को अपने वचनामृत से अनुगृहीत किया और फिर मुख्य मंत्रियों के साथ प्रशस्त समय में सभा में गये ॥२॥ उपविष्टममुं निवेद्य तत्र प्रतिहारैरुपलब्धप्रवेशः । अबदद् गिरमेत्य गाढगर्वमित्थ सन्देशहरः शकाधिपस्य ॥ ३ ॥ सभा में आसीन राजा हम्मीर को निवेदन करके और उनकी आज्ञा पाकर प्रतिहारों ने म्लेच्छपति अलाउद्दीन के सन्देशवाहक राजदूत को सभा में प्रविष्ट किया और उसने हम्मीरदेव से इस प्रकार अत्यन्त गर्वपूर्ण वचन कहे ॥ ३ ॥ प्रथितः पृथुविक्रमः पृथिव्यां यवनानामधिभूरलावुदीनः । प्रहितोऽत्र हितोपदेशकारी भवतोऽहं भुवनस्य तेन भर्त्रा ॥ ४ ॥ अपने महान् पराक्रम के कारण पृथ्वी में विख्यात लोकपति म्लेच्छों के स्वामी अलाउद्दीन ने मुझे आपको हितकारक उपदेश देने के लिये आपके पास भेजा है ॥ ४ ॥ उदयं चरमाद्रिमन्तराऽस्यां वसुमत्यां निवसन्ति येऽवनीशाः । वितरन्ति कृषीबला इवास्य प्रसभास्कन्दनभीरवः करं ते ॥ ५ ॥ उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक इस पृथ्वी में जितने राजा हैं वे सब, अलाउद्दीन के प्रबल आक्रमण से डरकर, किसानों के समान, इनको कर देते हैं ॥ ५ ॥ इह कश्चन योऽभिमानशाली नहि दित्सेत नराधिपोऽस्य दण्डम् । भवति स्वयमेव तस्य मूर्ध्नि प्रबलो दण्डधरो धराधिनाथः ॥ ६ ॥ जो कोई अभिमानी राजा सुलतान को कर नहीं देता उसके मस्तक पर स्वयं पृथ्वीपति अला- उद्दीन का प्रबल दण्ड पड़ता है ॥ ६ ॥ अविमर्शनवशेन गर्वतो वा किमु भाविब्यसनस्य शासनाद् वा । मतिमानपि मूढधीरिव त्वं नृप जानासि हिताहिते न किञ्चित् ॥ ७ ॥ राजन् ! बुद्धिमान् होते हुये भी आप, अविवेक के कारण अथवा अभिमान के कारण अथवा भावी विपत्ति की प्रेरणा के कारण, मूर्ख के समान, अपने हिताहित के ज्ञान से क्यों शून्य हो गये हैं ? ॥ ७ ॥

द्वादशः सर्गः १२७ अखिलामपि शासतो धरित्रीं समतीताः शरदोऽस्य सप्तसङ्ख्याः । न करै र्न च सेवयापि तावद् भवता तस्य कृता मनोऽनुवृत्तिः ॥ ८ ॥ सारी पृथिवी पर शासन करते हुए सुलतान को सात वर्ष हो चुके हैं, किन्तु आपने अभी तक न तो कर देकर और न अपनी सेवा से सुलतान को प्रसन्न किया ॥ ८ ॥ कृपयाप्यवधीरणेन वाऽसौ हृदि नाधत्त नृपस्तवापराधम् । भवतोऽजनि दुर्मदो महीयानथ तेनात्मविनाशहेतुरेषः ॥ ९ ॥ अपनी कृपा के कारण अथवा अवज्ञा के कारण सुलतान ने आपके अपराध पर ध्यान नहीं दिया, किन्तु इससे आपका मिथ्याभिमान अत्यन्त बढ़ गया। जान लीजिये कि यह आपके विनाश का कारण सिद्ध होगा ॥ ९ ॥ बहुशः कृतविक्रियान् महीशे महिमाशाहमुखांस्तुरुष्कमुख्यान् । दधता निजसैनिकाधिपत्ये भवताऽयं विहितोऽपरोऽपराधः ॥ १०॥ सुलतान अलाउद्दीन के अनेक अपकार करने वाले महिमाशाह (मीर मुहम्मद शाह) आदि यवन-श्रेष्ठों को अपने सेनापति पद पर नियुक्त करके आपने यह दूसरा अपराध किया है ॥ १०॥ बहुभि र्बत शंसितैः किमन्यै र्जंगराख्यं पुरमेव यद् व्यभाङ्क्षीः । यवनेश्वरसोदरेण यस्मिन् निजसामन्तनिवेशनं वितेने ॥ ११ ॥ आपके अन्य अनेक अपराधों को कहाँ तक कहूँ, और तो और, आपने यवनेश्वर अलाउद्दीन के सगे भाई उलुग खाँ के, अपने सामन्तों के लिये, जगरपुर में बनाये गये शिविर तक को नष्ट भ्रष्ट कर दिया ॥ ११ ॥ चतुरम्बुधिमेखलान्तरे यः सहते न स्वनिदेशनस्य भङ्गम् । पुरभङ्गमभङ्गुरप्रतापः स कथं हन्त सहेत सोदरस्य ॥ १२॥ चारों समुद्र-रूपी रशना से सुशोभित पृथिवी में जो अक्षुण्ण प्रताप वाला सुलतान अपनी आज्ञा का भंग नहीं सहता वह अपने सगे भाई के नगर का भंग किस प्रकार सह सकता है ? ॥ १२॥ बलवत्यपि बालबुद्धितोऽयं गमितो वैरतरुस्त्वयाऽभिवृद्धिम् । उपनेष्यति निश्चयेन राजन्नचिरेणैव पचेलिमं फलं ते ॥ १३॥ राजन् ! आपने अपनी मूर्खता के कारण, शत्रु के बलवान् होने पर भी, इस वैर-वृक्ष को खूब सींच कर बढ़ाया है और अब बहुत शीघ्र ही निश्चित रूप से आपको इसका पका फल मिलेगा ॥ १३॥ सहजेतरकर्मणि प्रवृत्ताश्चपलत्वाल्लघवः प्रयान्ति नाशम् । गगनोत्पतने धृतप्रयत्ना बिलसंस्था इव कीटकाः सपक्षाः ॥ १४॥ क्षुद्र पुरुष चपलता के कारण सामर्थ्य से बाहर अस्वाभाविक कार्य में प्रवृत्त होकर नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार बिल में रहने वाले छोटे-छोटे कीड़े अपने पंखों से आकाश को नापने का प्रयत्न करके नष्ट हो जाते हैं ॥ १४॥

१२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अधुनापि गताऽऽग्रहो यदि स्याः क्षणमन्धङ्करणं मदं निगृह्य । नियतं त्वयि धास्यति प्रसादं करुणार्द्रो हि महान् ममावनीशः ॥१५॥ अन्धा बनाने वाले मद को क्षण भर के लिये रोक कर यदि आप अब भी अपने दुराग्रह को छोड़ दें, तो सुलतान अवश्य ही आप पर प्रसन्न हो जायेंगे क्योंकि मेरे स्वामी अत्यन्त दयालु हैं ॥१५॥ घनशृङ्खलया निबध्य कण्ठं पशुमालभ्यमिवाशु पञ्जरस्थम् । प्रथमं सह तैस्तुरुष्कमख्यै र्महिमाशाहमुपायनीकुरुष्व ॥१६॥ सुलतान के भय से भागकर आये उन यवन-श्रेष्ठों के साथ पहले महिमाशाह (मीर मुहम्मद शाह) को पिंजरे में बन्द करके और कंठ में मोटी साँकल से बाँधकर, यज्ञ में बलिदान किये जाने वाले पशु के समान, सुलतान अलाउद्दीन की सेवा में शीघ्र उपस्थित कीजिये ॥१६॥ उपदीकृतमानतैः पुरा यत् तव वंश्यैः शकभृत्तेऽनुवर्षम् । समु

१७ द्वादशः सर्गः १२९

गिरमित्थमुदीर्य मुद्रितास्ये रिपुसन्देशहरे नरेन्द्रवर्यः । वदति स्म नवाम्बुदोपमानस्वरसंभेदसमुद्धुरां स वाणीम् ॥२२॥ इस प्रकार के वचन कह कर शत्रुसन्देशहारी दूत के चुप हो जाने पर राजश्रेष्ठ हम्मीरदेव नवीन मेघ के स्वर के समान गंभीर स्वर से शोभित वचन बोले ॥२२॥ बहुशोऽद्भुतपौरुषप्रपञ्चं भवता वर्णयता निजस्य भर्तुः । प्रतिपादित एव दूतयोग्यः प्रभुभक्तिप्रगुणीकृतो गुणौघः ॥२३॥ आपने अपने स्वामी सुलतान अलाउद्दीन के अद्भुत पराक्रम का विस्तृत वर्णन करने में, एक कुशल दूत के समान, अपने स्वामी के गुण-समूह को, प्रभुभक्ति के कारण, कई गुना बढ़ा-चढ़ा कर कहा है ॥२३॥ असतोऽपि समर्थयन्ति केचित् परदोषात्मगुणानतिप्रगल्भाः । प्रकटानपि तान् प्रवक्तुमन्ये विनयाधीनधियो न शक्नुवन्ति ॥२४॥ कोई-कोई अत्यन्त चतुर पुरुष दूसरे के दोषों का और अपने गुणों का, उनके वस्तुतः अविद्यमान होने पर भी, समर्थन करते हैं; किन्तु विनय से शोभित बुद्धि वाले पुरुष दूसरे के दोषों को को और अपने गुणों को, उनके प्रकट होने पर भी, अपने मुख से उन्हें कहना नहीं चाहते ॥२४॥ बहवो यवनेषु सार्वभौमाः श्रुतपूर्वाः प्रततीकृतप्रतापाः । विजिताः कतिचित् कृतोपकारा मिलिताः केचन पूर्वजैर्मदीयैः ॥ २५॥ बहुत से विस्तृत प्रताप वाले यवन राजाओं का वर्णन हमने सुना है। उनमें से बहुतों को तो हमारे पूर्वजों ने जीत लिया था और बहुत से हमारे पूर्वजों द्वारा कृत उपकार के कारण उनसे मिल गये थे ॥२५॥ रिपुमण्डलमर्कमण्डलं वा तरसोच्चैःपदलब्धये भिनत्ति । तनुते प्रणते करावलम्बं करदानं नहि चाहुवाणवंशः ॥२६॥ चौहाणवंश, उच्च पद को प्राप्त करने के लिये, वेग से या तो शत्रुमंडल को भेदता है या सूर्य मंडल को । (अर्थात् या तो शत्रुओं के मंडल को नष्ट करके राज्य-पद पर आरूढ रहता है और या युद्ध में काम आकर सूर्यमंडल को भेदकर स्वर्ग-पद प्राप्त करता है। युद्ध में मरने वाले वीर आदित्यमार्ग से स्वर्ग जाते हैं ।) चौहाणवंश, (अपने चरणों में) झुकने वाले पुरुष को करावलम्बन (हाथ का सहारा) देता है अर्थात् अपने हाथ के सहारे उसे उठाता है; वह (अन्य राजाओं को) कभी कर नहीं देता ॥२६॥ मम पूर्वभवः पुरा प्रवीरान् हरिराजः परिभूय पारसीकान् । उपयोधपुरं दुरन्तदुर्गं रचयामास चिराय चारुकीर्तिः ॥२७॥ हमारे पूर्वज हरिराज ने प्राचीन काल में वीर यवनों को परास्त करके जोधपुर के समीप दुर्धर्ष दुर्ग बनवाया था जिससे उनकी सुन्दर कीर्ति आज भी अमर है ॥२७॥


(२६) युद्धे निहता वीराः सूर्यमण्डलं भित्वा स्वर्गं गच्छन्ति । तदुक्तं—'द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनी । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ।।' इति ।

१३० सुर्ज्जनचरितमहाकाव्यम् अपरः परवीरचक्रहन्ता भुवि चामुण्डसमाख्यया प्रतीतः । समरे शकचक्रवर्तिनं तं विनियम्य स्वपुरं समानिनाय ॥२८॥ शत्रुवीरों के समुदाय को मारने वाले, चामुण्डराज नाम से विख्यात, हमारे एक और पूर्वज हुये हैं जो यवनों के चक्रवर्ती राजा को युद्ध में कैद करके अपने नगर में ले आये थे ॥२८॥ पुरुहूतदिशं जलालुदीने चलिते दूरमनन्तरैर्निरुद्धम् । पुरमस्य च योगिनीपुराख्यं निजशौर्येण ररक्ष जैत्रसिंहः ॥२९॥ सुलतान जलालुद्दीन के पूर्व दिशा में दूर तक चले जाने पर जब उनके योगिनीपुर नामक नगर को सीमावर्ती शत्रुओं ने घेर लिया था तब हमारे पिता जैत्रसिंह ने अपने पराक्रम से उस नगर की रक्षा की थी ॥२९॥ मम सैनिकपूरणं कियद् वा महिमाशाहमुखाः शका विदध्युः । तव भूमिपते र्भयात् प्रपन्नाः शरणं मामिति रक्षिताः स्वदेशे ॥३०॥ महिमाशाह आदि यवनश्रेष्ठ हमारी सेना की क्या पूर्ति करेंगे ? तुम्हारे सुलतान के भय से ये लोग हमारी शरण में आये हैं इसलिये हम अपने देश में इनकी रक्षा कर रहे हैं॥३०॥ निजजीवनमप्युपेक्षमाणैः शरणार्थी न विमुच्यते महद्भिः । शिबिरे यदि विप्रतिष्ठमानः प्रथमोदाहरणं बभूव तत्र ॥३१॥ महान् पुरुष अपने जीवन तक की उपेक्षा कर देते हैं, किन्तु शरणार्थी को नहीं छोड़ते। फिर यदि (वीर और कृतज्ञ) महिमाशाह हमारे शिविर में (सेनापति पद पर) प्रतिष्ठित हैं, तो यह (शरणार्थियों की रक्षा और सम्मान का) पहला उदाहरण है ॥३१॥ जगराख्यपुरस्य यद् विमर्दोऽजनि तत्राप्यपरस्य कोऽस्ति दोषः । यदिहाल्पतरेऽपि सम्पराये तदुलूग्खानपलायनं निदानम् ॥३२॥ जगरपुर नामक नगर यदि नष्टभ्रष्ट हुआ तो इसमें भी हमारा क्या दोष है ? इसका कारण तो जरा सा युद्ध छिड़ते ही उलूबखाँ का भाग जाना है ॥३२॥ समराङ्गणसीम्नि दत्तभङ्गे स्वयमेवाधिपतौ पताकिनीनाम् । शिविरं द्रविणाढ्यमप्रवीरं किमु लुण्टाकगणः क्षमेत मोक्तुम् ॥३३॥ युद्धक्षेत्र में सेनाओं के स्वामी को परास्त करके भगा देने पर यदि हमारी सेना ने विपुल धन राशि से युक्त और वीर रक्षकों से रहित शिविर को अधिकृत कर लिया तो इसमें कौन-सी बुरी बात है; अरक्षित और धनयुक्त स्थान को तो लुटेरे लोग भी नहीं छोड़ते ॥३३॥ निहतः कपटाज्जलालुदीनो यदि दीनो ननु सोऽस्ति वीरगोष्ठ्याम् । सुभटा हि निजक्षताङ्गजालैरभिषिञ्चन्ति यशोमयं शरीरम् ॥३४॥ तुम्हारे सुलतान अलाउद्दीन ने यदि छलपूर्वक (अपने चाचा और ससुर) बिचारे सुलतान (३३) लुण्टाकगणो दस्युसमूहः। (३४) अलाउद्दीनः स्वस्य पितृव्यं श्वसुरं जलालुद्दीनं कपटेन घातयित्वा राजा बभूव।

द्वादशः सर्गः १३१ जलालुद्दीन को मरवा दिया तो इसमें अभिमान की कौन बात है ? जलालुद्दीन ने तो वीर पद ही प्राप्त किया, क्योंकि वीर-पुरुष अपने घावों से बहने वाले रक्त से अपने यशः शरीर को सींचते हैं ॥३४॥ इयती कियती विकत्थना वा यदि रुद्धं पुरमङ्ग मत्परोक्षम् । सदनं यदि शून्यतामुपेतं प्रविशेत् तत्र जवेन जम्बुकोऽपि ॥३५॥ दूत ! यदि तुम्हारे सुलतान ने, मेरे यहाँ न रहने पर, इस रणस्तम्भपुर को घेर लिया तो इसमें इतनी बड़ी डींग हाँकने की क्या बात है ? शून्य घर में तो गीदड़ भी वेग से घुस जाता है ॥३५॥ उपरुध्य पुरं ममाऽसमक्षं स्वयमुद्गीर्णमनोमलस्त्वेशः । मयि सन्दिशति स्म सन्धिवार्ता विपरीतं चतुरत्वमेतदीयम् ॥३६॥ हमारे यहाँ न रहने पर रणस्तम्भपुर को घेर कर तुम्हारे स्वामी ने अपने मन का कपट- विष उगल दिया है और अब वे हमारे पास सन्धि का सन्देश भेजते हैं ! उनकी चतुरता विचित्र है ! ॥३६॥ शरवत् समरान्तरे प्रवीराः सुखमाविष्कृतनादमापतन्ति । भुजगा इव सञ्चरन्ति चौराः पररन्ध्रं परितो गवेषयन्तः ॥३७॥ वीर लोग बाण के समान गरजते हुये युद्धभूमि में कूदते हैं और चोर, साँपों की तरह, दूसरे के छेद (बिल को ; कमी को) ढूँढते हुये चारों ओर रेंगते हैं ॥३७॥ अकरोत् मम पामरः परोक्षं पुररोधं यदि पौरुषं कियद् वा । प्रकटीकुरुतां पुनः स्वशक्ति स पुरः सम्प्रति सम्परायसीम्नि ॥३८॥ हमारे परोक्ष में यदि उस नीच सुलतान ने हमारे नगर को घेर लिया तो इसमें क्या पराक्रम किया ! अब वह हमारे आगे युद्धक्षेत्र में अपनी शक्ति दिखलावे ! ॥३८॥ इतिवादिनि शत्रुवर्गजैत्रे तनये जैत्रमहीपतेः स दूतः । विरहय्य निजासनं यियासुः प्रखरो वाग्विषमुज्जगार घोरम् ॥३९॥ शत्रुवर्ग को जीतने वाले, जैत्रसिंह के पुत्र हम्मीरदेव के इस प्रकार कहने पर वह दूत अपने आसन को छोड़कर खड़ा हो गया और जाते-जाते उसने इस प्रकार के घोर वाग्विष को उगला ॥३९॥ निजकालनिदेशभाजि मृत्यौ भृशमास्कन्दितमूर्ध्नि मानवानाम् । सुहृदोऽपि गिरो विशन्ति नान्तः किमुताऽरातिवचोहरोपनीताः ॥४०॥ जब अपने काल के आदेश से युक्त मृत्यु मनुष्यों के मस्तक पर अच्छी तरह मँडराने लगती है तब मित्रों की बाणी भी उनके हृदय में नहीं उतरती, फिर शत्रु के सन्देश लाने वाले दूत की वाणी की तो बात ही क्या ! ॥४०॥