सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अधुनापि गताऽऽग्रहो यदि स्याः क्षणमन्धङ्करणं मदं निगृह्य । नियतं त्वयि धास्यति प्रसादं करुणार्द्रो हि महान् ममावनीशः ॥१५॥ अन्धा बनाने वाले मद को क्षण भर के लिये रोक कर यदि आप अब भी अपने दुराग्रह को छोड़ दें, तो सुलतान अवश्य ही आप पर प्रसन्न हो जायेंगे क्योंकि मेरे स्वामी अत्यन्त दयालु हैं ॥१५॥ घनशृङ्खलया निबध्य कण्ठं पशुमालभ्यमिवाशु पञ्जरस्थम् । प्रथमं सह तैस्तुरुष्कमख्यै र्महिमाशाहमुपायनीकुरुष्व ॥१६॥ सुलतान के भय से भागकर आये उन यवन-श्रेष्ठों के साथ पहले महिमाशाह (मीर मुहम्मद शाह) को पिंजरे में बन्द करके और कंठ में मोटी साँकल से बाँधकर, यज्ञ में बलिदान किये जाने वाले पशु के समान, सुलतान अलाउद्दीन की सेवा में शीघ्र उपस्थित कीजिये ॥१६॥ उपदीकृतमानतैः पुरा यत् तव वंश्यैः शकभृत्तेऽनुवर्षम् । समु