भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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द्वादशः सर्गः १२७ अखिलामपि शासतो धरित्रीं समतीताः शरदोऽस्य सप्तसङ्ख्याः । न करै र्न च सेवयापि तावद् भवता तस्य कृता मनोऽनुवृत्तिः ॥ ८ ॥ सारी पृथिवी पर शासन करते हुए सुलतान को सात वर्ष हो चुके हैं, किन्तु आपने अभी तक न तो कर देकर और न अपनी सेवा से सुलतान को प्रसन्न किया ॥ ८ ॥ कृपयाप्यवधीरणेन वाऽसौ हृदि नाधत्त नृपस्तवापराधम् । भवतोऽजनि दुर्मदो महीयानथ तेनात्मविनाशहेतुरेषः ॥ ९ ॥ अपनी कृपा के कारण अथवा अवज्ञा के कारण सुलतान ने आपके अपराध पर ध्यान नहीं दिया, किन्तु इससे आपका मिथ्याभिमान अत्यन्त बढ़ गया। जान लीजिये कि यह आपके विनाश का कारण सिद्ध होगा ॥ ९ ॥ बहुशः कृतविक्रियान् महीशे महिमाशाहमुखांस्तुरुष्कमुख्यान् । दधता निजसैनिकाधिपत्ये भवताऽयं विहितोऽपरोऽपराधः ॥ १०॥ सुलतान अलाउद्दीन के अनेक अपकार करने वाले महिमाशाह (मीर मुहम्मद शाह) आदि यवन-श्रेष्ठों को अपने सेनापति पद पर नियुक्त करके आपने यह दूसरा अपराध किया है ॥ १०॥ बहुभि र्बत शंसितैः किमन्यै र्जंगराख्यं पुरमेव यद् व्यभाङ्क्षीः । यवनेश्वरसोदरेण यस्मिन् निजसामन्तनिवेशनं वितेने ॥ ११ ॥ आपके अन्य अनेक अपराधों को कहाँ तक कहूँ, और तो और, आपने यवनेश्वर अलाउद्दीन के सगे भाई उलुग खाँ के, अपने सामन्तों के लिये, जगरपुर में बनाये गये शिविर तक को नष्ट भ्रष्ट कर दिया ॥ ११ ॥ चतुरम्बुधिमेखलान्तरे यः सहते न स्वनिदेशनस्य भङ्गम् । पुरभङ्गमभङ्गुरप्रतापः स कथं हन्त सहेत सोदरस्य ॥ १२॥ चारों समुद्र-रूपी रशना से सुशोभित पृथिवी में जो अक्षुण्ण प्रताप वाला सुलतान अपनी आज्ञा का भंग नहीं सहता वह अपने सगे भाई के नगर का भंग किस प्रकार सह सकता है ? ॥ १२॥ बलवत्यपि बालबुद्धितोऽयं गमितो वैरतरुस्त्वयाऽभिवृद्धिम् । उपनेष्यति निश्चयेन राजन्नचिरेणैव पचेलिमं फलं ते ॥ १३॥ राजन् ! आपने अपनी मूर्खता के कारण, शत्रु के बलवान् होने पर भी, इस वैर-वृक्ष को खूब सींच कर बढ़ाया है और अब बहुत शीघ्र ही निश्चित रूप से आपको इसका पका फल मिलेगा ॥ १३॥ सहजेतरकर्मणि प्रवृत्ताश्चपलत्वाल्लघवः प्रयान्ति नाशम् । गगनोत्पतने धृतप्रयत्ना बिलसंस्था इव कीटकाः सपक्षाः ॥ १४॥ क्षुद्र पुरुष चपलता के कारण सामर्थ्य से बाहर अस्वाभाविक कार्य में प्रवृत्त होकर नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार बिल में रहने वाले छोटे-छोटे कीड़े अपने पंखों से आकाश को नापने का प्रयत्न करके नष्ट हो जाते हैं ॥ १४॥