भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

द्वादशः सर्गः अथ वीक्ष्य पुरं परोपरुद्धं कुलभूपालपरम्परोपनीतम् । न जहौ निजमाननप्रसादं विमनाः सन्नपि मानवाधिनाथः ॥ १ ॥ इसके बाद, कुल-परम्परागत रणस्तम्भपुर को शत्रुओं से घिरा हुआ देखकर राजा हम्मीर- देव ने, दुःखी होकर भी, अपने मुख की प्रसन्नमुद्रा को नहीं छोड़ा ॥ १ ॥ अनुगृह्य वचोऽमृतेन पौरान् भृशमार्तानपि मर्त्यलोकभर्ता । स चिरात् सचिवैरुपास्यमानः समये संसद्माससाद शस्ते ॥ २ ॥ मर्त्यलोक के राजा हम्मीर ने अत्यन्त पीड़ित पुरवासियों को अपने वचनामृत से अनुगृहीत किया और फिर मुख्य मंत्रियों के साथ प्रशस्त समय में सभा में गये ॥२॥ उपविष्टममुं निवेद्य तत्र प्रतिहारैरुपलब्धप्रवेशः । अबदद् गिरमेत्य गाढगर्वमित्थ सन्देशहरः शकाधिपस्य ॥ ३ ॥ सभा में आसीन राजा हम्मीर को निवेदन करके और उनकी आज्ञा पाकर प्रतिहारों ने म्लेच्छपति अलाउद्दीन के सन्देशवाहक राजदूत को सभा में प्रविष्ट किया और उसने हम्मीरदेव से इस प्रकार अत्यन्त गर्वपूर्ण वचन कहे ॥ ३ ॥ प्रथितः पृथुविक्रमः पृथिव्यां यवनानामधिभूरलावुदीनः । प्रहितोऽत्र हितोपदेशकारी भवतोऽहं भुवनस्य तेन भर्त्रा ॥ ४ ॥ अपने महान् पराक्रम के कारण पृथ्वी में विख्यात लोकपति म्लेच्छों के स्वामी अलाउद्दीन ने मुझे आपको हितकारक उपदेश देने के लिये आपके पास भेजा है ॥ ४ ॥ उदयं चरमाद्रिमन्तराऽस्यां वसुमत्यां निवसन्ति येऽवनीशाः । वितरन्ति कृषीबला इवास्य प्रसभास्कन्दनभीरवः करं ते ॥ ५ ॥ उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक इस पृथ्वी में जितने राजा हैं वे सब, अलाउद्दीन के प्रबल आक्रमण से डरकर, किसानों के समान, इनको कर देते हैं ॥ ५ ॥ इह कश्चन योऽभिमानशाली नहि दित्सेत नराधिपोऽस्य दण्डम् । भवति स्वयमेव तस्य मूर्ध्नि प्रबलो दण्डधरो धराधिनाथः ॥ ६ ॥ जो कोई अभिमानी राजा सुलतान को कर नहीं देता उसके मस्तक पर स्वयं पृथ्वीपति अला- उद्दीन का प्रबल दण्ड पड़ता है ॥ ६ ॥ अविमर्शनवशेन गर्वतो वा किमु भाविब्यसनस्य शासनाद् वा । मतिमानपि मूढधीरिव त्वं नृप जानासि हिताहिते न किञ्चित् ॥ ७ ॥ राजन् ! बुद्धिमान् होते हुये भी आप, अविवेक के कारण अथवा अभिमान के कारण अथवा भावी विपत्ति की प्रेरणा के कारण, मूर्ख के समान, अपने हिताहित के ज्ञान से क्यों शून्य हो गये हैं ? ॥ ७ ॥