सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः १२५ द्रुततरमतिरौद्रः पारसीकस्य भर्तुः प्रबलबलसमूहः सूचयन् भाव्यनर्थम् । परिधिरिव गरीयान् मण्डलञ्चण्डभानो र्नगरमरमरौत्सोच्चाहुवाणान्वयस्य ॥ म्लेच्छपति अलाउद्दीन के अत्यन्त भयंकर और प्रवल सेनासमूह ने, भावी अनर्थ की सूचना देते हुए, चौहान वंश के हम्मीरदेव के रणस्तम्भपुर नामक नगर को शीघ्र घेर लिया, जिस प्रकार एक बड़ी भारी परिधि सूर्यबिम्ब को घेर लेती है (सूर्य के चारों ओर घेरा सा दिखाई देना अशुभ माना जाता है) ॥७१॥ अवनिः स्वयमीयुषी प्रकम्पं निजभर्तुर्व्यसनागमं समीक्ष्य । जनता यवनेशसैन्यभारे भृशमारोपयति स्म दूषणानि ॥७२॥ स्वयं पृथ्वी भी, अपने स्वामी हम्मीर के भावी व्यसन का विचार करके हिल उठी (भूकम्प आना भी अशुभ माना जाता है) ; लोगों ने व्यर्थ ही में यवनपति की सेना पर यह दोष दिया कि यवनसेना के चलने से पृथ्वी हिल रही है ॥७२॥ निर्घातोग्रस्वानमिश्रः समन्तादुल्कादण्डः प्रादुरासीत् प्रचण्डः । आग्नेयास्त्रं गोलकारावमिश्रं दुर्गान्तस्थैर्द्वेषिणां मन्यते स्म ॥७३॥ चारों ओर भीषण शब्द करता हुआ एक प्रचण्ड तारा आकाश से टूट गिरा (तारा टूटना भी अशुभ माना जाता है) ; किन्तु दुर्ग में रहनेवाले लोगों ने उसे शत्रुओं की विकट ध्वनि के साथ गोले छोड़ने वाले तोप की चमक और गर्जना समझा ॥७३॥ जैत्रात्मजोऽपि जितभीतिरनन्यचेता निर्वर्त्य कृत्यमखिलं विधिनोपनीतम् । श्रुत्वापि दुर्गमुपरुद्धममित्रसैन्यैर्नांतित्वरो निववृते निजपत्तनाय ॥७४॥ जैत्रसिंह के पुत्र निर्भय हम्मीरदेव, अनन्यचित्त से सम्पूर्ण कार्य को विधिपूर्वक समाप्त करवा कर, अपने रणस्तम्भपुर दुर्ग को शत्रुओं की सेना से घिरा हुआ जानकर भी, नगर की ओर बहुत अधिक व्यग्रता से नहीं लौटे ॥७४॥ इति श्री सुर्जनचरितमहाकाव्ये एकादशः सर्गः ।