भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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१७ द्वादशः सर्गः १२९

गिरमित्थमुदीर्य मुद्रितास्ये रिपुसन्देशहरे नरेन्द्रवर्यः । वदति स्म नवाम्बुदोपमानस्वरसंभेदसमुद्धुरां स वाणीम् ॥२२॥ इस प्रकार के वचन कह कर शत्रुसन्देशहारी दूत के चुप हो जाने पर राजश्रेष्ठ हम्मीरदेव नवीन मेघ के स्वर के समान गंभीर स्वर से शोभित वचन बोले ॥२२॥ बहुशोऽद्भुतपौरुषप्रपञ्चं भवता वर्णयता निजस्य भर्तुः । प्रतिपादित एव दूतयोग्यः प्रभुभक्तिप्रगुणीकृतो गुणौघः ॥२३॥ आपने अपने स्वामी सुलतान अलाउद्दीन के अद्भुत पराक्रम का विस्तृत वर्णन करने में, एक कुशल दूत के समान, अपने स्वामी के गुण-समूह को, प्रभुभक्ति के कारण, कई गुना बढ़ा-चढ़ा कर कहा है ॥२३॥ असतोऽपि समर्थयन्ति केचित् परदोषात्मगुणानतिप्रगल्भाः । प्रकटानपि तान् प्रवक्तुमन्ये विनयाधीनधियो न शक्नुवन्ति ॥२४॥ कोई-कोई अत्यन्त चतुर पुरुष दूसरे के दोषों का और अपने गुणों का, उनके वस्तुतः अविद्यमान होने पर भी, समर्थन करते हैं; किन्तु विनय से शोभित बुद्धि वाले पुरुष दूसरे के दोषों को को और अपने गुणों को, उनके प्रकट होने पर भी, अपने मुख से उन्हें कहना नहीं चाहते ॥२४॥ बहवो यवनेषु सार्वभौमाः श्रुतपूर्वाः प्रततीकृतप्रतापाः । विजिताः कतिचित् कृतोपकारा मिलिताः केचन पूर्वजैर्मदीयैः ॥ २५॥ बहुत से विस्तृत प्रताप वाले यवन राजाओं का वर्णन हमने सुना है। उनमें से बहुतों को तो हमारे पूर्वजों ने जीत लिया था और बहुत से हमारे पूर्वजों द्वारा कृत उपकार के कारण उनसे मिल गये थे ॥२५॥ रिपुमण्डलमर्कमण्डलं वा तरसोच्चैःपदलब्धये भिनत्ति । तनुते प्रणते करावलम्बं करदानं नहि चाहुवाणवंशः ॥२६॥ चौहाणवंश, उच्च पद को प्राप्त करने के लिये, वेग से या तो शत्रुमंडल को भेदता है या सूर्य मंडल को । (अर्थात् या तो शत्रुओं के मंडल को नष्ट करके राज्य-पद पर आरूढ रहता है और या युद्ध में काम आकर सूर्यमंडल को भेदकर स्वर्ग-पद प्राप्त करता है। युद्ध में मरने वाले वीर आदित्यमार्ग से स्वर्ग जाते हैं ।) चौहाणवंश, (अपने चरणों में) झुकने वाले पुरुष को करावलम्बन (हाथ का सहारा) देता है अर्थात् अपने हाथ के सहारे उसे उठाता है; वह (अन्य राजाओं को) कभी कर नहीं देता ॥२६॥ मम पूर्वभवः पुरा प्रवीरान् हरिराजः परिभूय पारसीकान् । उपयोधपुरं दुरन्तदुर्गं रचयामास चिराय चारुकीर्तिः ॥२७॥ हमारे पूर्वज हरिराज ने प्राचीन काल में वीर यवनों को परास्त करके जोधपुर के समीप दुर्धर्ष दुर्ग बनवाया था जिससे उनकी सुन्दर कीर्ति आज भी अमर है ॥२७॥


(२६) युद्धे निहता वीराः सूर्यमण्डलं भित्वा स्वर्गं गच्छन्ति । तदुक्तं—'द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनी । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ।।' इति ।