भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 156

१३० सुर्ज्जनचरितमहाकाव्यम् अपरः परवीरचक्रहन्ता भुवि चामुण्डसमाख्यया प्रतीतः । समरे शकचक्रवर्तिनं तं विनियम्य स्वपुरं समानिनाय ॥२८॥ शत्रुवीरों के समुदाय को मारने वाले, चामुण्डराज नाम से विख्यात, हमारे एक और पूर्वज हुये हैं जो यवनों के चक्रवर्ती राजा को युद्ध में कैद करके अपने नगर में ले आये थे ॥२८॥ पुरुहूतदिशं जलालुदीने चलिते दूरमनन्तरैर्निरुद्धम् । पुरमस्य च योगिनीपुराख्यं निजशौर्येण ररक्ष जैत्रसिंहः ॥२९॥ सुलतान जलालुद्दीन के पूर्व दिशा में दूर तक चले जाने पर जब उनके योगिनीपुर नामक नगर को सीमावर्ती शत्रुओं ने घेर लिया था तब हमारे पिता जैत्रसिंह ने अपने पराक्रम से उस नगर की रक्षा की थी ॥२९॥ मम सैनिकपूरणं कियद् वा महिमाशाहमुखाः शका विदध्युः । तव भूमिपते र्भयात् प्रपन्नाः शरणं मामिति रक्षिताः स्वदेशे ॥३०॥ महिमाशाह आदि यवनश्रेष्ठ हमारी सेना की क्या पूर्ति करेंगे ? तुम्हारे सुलतान के भय से ये लोग हमारी शरण में आये हैं इसलिये हम अपने देश में इनकी रक्षा कर रहे हैं॥३०॥ निजजीवनमप्युपेक्षमाणैः शरणार्थी न विमुच्यते महद्भिः । शिबिरे यदि विप्रतिष्ठमानः प्रथमोदाहरणं बभूव तत्र ॥३१॥ महान् पुरुष अपने जीवन तक की उपेक्षा कर देते हैं, किन्तु शरणार्थी को नहीं छोड़ते। फिर यदि (वीर और कृतज्ञ) महिमाशाह हमारे शिविर में (सेनापति पद पर) प्रतिष्ठित हैं, तो यह (शरणार्थियों की रक्षा और सम्मान का) पहला उदाहरण है ॥३१॥ जगराख्यपुरस्य यद् विमर्दोऽजनि तत्राप्यपरस्य कोऽस्ति दोषः । यदिहाल्पतरेऽपि सम्पराये तदुलूग्खानपलायनं निदानम् ॥३२॥ जगरपुर नामक नगर यदि नष्टभ्रष्ट हुआ तो इसमें भी हमारा क्या दोष है ? इसका कारण तो जरा सा युद्ध छिड़ते ही उलूबखाँ का भाग जाना है ॥३२॥ समराङ्गणसीम्नि दत्तभङ्गे स्वयमेवाधिपतौ पताकिनीनाम् । शिविरं द्रविणाढ्यमप्रवीरं किमु लुण्टाकगणः क्षमेत मोक्तुम् ॥३३॥ युद्धक्षेत्र में सेनाओं के स्वामी को परास्त करके भगा देने पर यदि हमारी सेना ने विपुल धन राशि से युक्त और वीर रक्षकों से रहित शिविर को अधिकृत कर लिया तो इसमें कौन-सी बुरी बात है; अरक्षित और धनयुक्त स्थान को तो लुटेरे लोग भी नहीं छोड़ते ॥३३॥ निहतः कपटाज्जलालुदीनो यदि दीनो ननु सोऽस्ति वीरगोष्ठ्याम् । सुभटा हि निजक्षताङ्गजालैरभिषिञ्चन्ति यशोमयं शरीरम् ॥३४॥ तुम्हारे सुलतान अलाउद्दीन ने यदि छलपूर्वक (अपने चाचा और ससुर) बिचारे सुलतान (३३) लुण्टाकगणो दस्युसमूहः। (३४) अलाउद्दीनः स्वस्य पितृव्यं श्वसुरं जलालुद्दीनं कपटेन घातयित्वा राजा बभूव।