भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

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द्वादशः सर्गः १३१ जलालुद्दीन को मरवा दिया तो इसमें अभिमान की कौन बात है ? जलालुद्दीन ने तो वीर पद ही प्राप्त किया, क्योंकि वीर-पुरुष अपने घावों से बहने वाले रक्त से अपने यशः शरीर को सींचते हैं ॥३४॥ इयती कियती विकत्थना वा यदि रुद्धं पुरमङ्ग मत्परोक्षम् । सदनं यदि शून्यतामुपेतं प्रविशेत् तत्र जवेन जम्बुकोऽपि ॥३५॥ दूत ! यदि तुम्हारे सुलतान ने, मेरे यहाँ न रहने पर, इस रणस्तम्भपुर को घेर लिया तो इसमें इतनी बड़ी डींग हाँकने की क्या बात है ? शून्य घर में तो गीदड़ भी वेग से घुस जाता है ॥३५॥ उपरुध्य पुरं ममाऽसमक्षं स्वयमुद्गीर्णमनोमलस्त्वेशः । मयि सन्दिशति स्म सन्धिवार्ता विपरीतं चतुरत्वमेतदीयम् ॥३६॥ हमारे यहाँ न रहने पर रणस्तम्भपुर को घेर कर तुम्हारे स्वामी ने अपने मन का कपट- विष उगल दिया है और अब वे हमारे पास सन्धि का सन्देश भेजते हैं ! उनकी चतुरता विचित्र है ! ॥३६॥ शरवत् समरान्तरे प्रवीराः सुखमाविष्कृतनादमापतन्ति । भुजगा इव सञ्चरन्ति चौराः पररन्ध्रं परितो गवेषयन्तः ॥३७॥ वीर लोग बाण के समान गरजते हुये युद्धभूमि में कूदते हैं और चोर, साँपों की तरह, दूसरे के छेद (बिल को ; कमी को) ढूँढते हुये चारों ओर रेंगते हैं ॥३७॥ अकरोत् मम पामरः परोक्षं पुररोधं यदि पौरुषं कियद् वा । प्रकटीकुरुतां पुनः स्वशक्ति स पुरः सम्प्रति सम्परायसीम्नि ॥३८॥ हमारे परोक्ष में यदि उस नीच सुलतान ने हमारे नगर को घेर लिया तो इसमें क्या पराक्रम किया ! अब वह हमारे आगे युद्धक्षेत्र में अपनी शक्ति दिखलावे ! ॥३८॥ इतिवादिनि शत्रुवर्गजैत्रे तनये जैत्रमहीपतेः स दूतः । विरहय्य निजासनं यियासुः प्रखरो वाग्विषमुज्जगार घोरम् ॥३९॥ शत्रुवर्ग को जीतने वाले, जैत्रसिंह के पुत्र हम्मीरदेव के इस प्रकार कहने पर वह दूत अपने आसन को छोड़कर खड़ा हो गया और जाते-जाते उसने इस प्रकार के घोर वाग्विष को उगला ॥३९॥ निजकालनिदेशभाजि मृत्यौ भृशमास्कन्दितमूर्ध्नि मानवानाम् । सुहृदोऽपि गिरो विशन्ति नान्तः किमुताऽरातिवचोहरोपनीताः ॥४०॥ जब अपने काल के आदेश से युक्त मृत्यु मनुष्यों के मस्तक पर अच्छी तरह मँडराने लगती है तब मित्रों की बाणी भी उनके हृदय में नहीं उतरती, फिर शत्रु के सन्देश लाने वाले दूत की वाणी की तो बात ही क्या ! ॥४०॥