सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सह सर्वबलेन तीर्णसिन्धुः प्रथितस्ते सविभीषणो विपक्षः । उपलम्भयिता भवन्तमिद्धं न चिरेणैव दशां दशाननस्य ॥४१॥ अपनी सारी सेना के साथ नदी पार करके यहाँ आने वाले आपके भयंकर शत्रु वे विख्यात अलाउद्दीन, जिनके साथ आपके घर का भेदी (आपका सेनापति रणमल्ल) जा मिला है, आपको शीघ्र ही उस दशा में पहुँचाने वाले हैं जिस दशा में विख्यात भगवान् राम ने, अपनी सारी सेना के साथ समुद्र पार करके, विभीषण को अपनी ओर मिला कर, रावण को पहुँचा दिया था ॥४१॥ घनसैनिकजालके हि तावद् विनिरुद्धोऽसि न निर्गमावकाशः । अलमुत्फलनेन मोक्ष्यसे त्वं नियतं मीनवदाशु जीवनेन ॥४२॥ आप चारों ओर से हमारे सैनिकों के घने जाल में घिर रहे हैं और आपके लिये बाहर निकल भागने का भी कोई मार्ग नहीं है । आपका उछल कूद मचाना बेकार है । निश्चित है कि आप अब शीघ्र ही जाल में फंसी हुई मछली के समान अपने जीवन से (प्राणों से; पानी से) अलग कर दिये जावेंगे ॥४२॥ अथ दुर्वचसं निरस्य दूतं नरनाथः परवाहिनीनिवेशम् । अभिवीक्षितुमाप्तमन्त्रिमुख्यैः सह दुर्गौघशिरः समारुरोह ॥४३॥ इस प्रकार के दुर्वचन बोलने वाले दूत को बाहर निकाल कर राजा हम्मीरदेव शत्रुसेना को देखने के लिये अपने मुख्य मंत्रियों के साथ दुर्ग के ऊपर चढ़े ॥४३॥ इदमाह च पश्यताऽश्वभर्तुर्वि निवेशं विपुलं वरूथिनीनाम् । अविभावितपारमम्बुराशेः प्रलयप्रेरितवारिपूरतुल्यम् ॥४४॥ और अपने मंत्रियों से इस प्रकार बोले—घुड़सवारों के स्वामी अलाउद्दीन की सेनाओं के, प्रलय वायु से प्रेरित समुद्र के जलसमूह के समान अपार, इस समूह को देखिये ॥४४॥ अनुवेलमियं सपत्नसेना मम सेनाभिरुपेयुषी विवृद्धिम् । गिरिनिर्झरिणीभिरुक्षिताया हरते हन्त रुचिं महाह्रदिन्याः ॥४५॥ हमारी सेनाओं के मिल जाने से निरन्तर बढ़ती हुई यह शत्रुसेना, पर्वतीय नदियों के संगम से निरन्तर बढ़ती हुई महानदी के समान लग रही है ॥४५॥ धनलालसया नवीनभूत्या यवनाऽऽपातभयेन चाभिजाताः । चिरकालनिरोधयन्त्रितत्वादिह निर्विण्णहृदः परे निरीयुः ॥४६॥ हमारी नगरी के कुछ नौजवान सैनिक धन के लोभ से उधर जा मिले हैं । नगरी के कुलीन लोग यवनों के आक्रमण के भय से और अन्य लोग बहुत दिनों से घेरा पड़े रहने के कारण दुखी होकर नगरी को छोड़-छोड़ कर जा रहे हैं ॥४६॥ (४१) स विभीषणो भयंकरो विभीषणसहितः रामश्च । विभीषणेनेव स्वपक्षविद्रोहिणा रणमल्लेन सहित इत्यपि गम्यते ।