सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशः सर्गः १३३ दिवसैरपरैः कियद्भिरेवं परिशून्या नियतं पुरी भवित्री । समरशममन्तरेण माभूत् करलभ्यं यवनस्य दुर्गमेतत् ॥४७॥ इस तरह अवश्य ही कुछ दिनों में हमारी नगरी जनशून्य हो जावेगी। फिर भी हमारी इच्छा है कि बिना युद्ध के यह दुर्ग यवन शत्रु के हाथ में नहीं पड़ने पावे ॥४७॥ न मुहूर्तविवेचनावकाशः पतितः संमुखमुल्वणः प्रतीपः । सदने सहसैव दह्यमाने जलशुद्धेर्नहि युज्यते विचारः ॥४८॥ उग्र शत्रु सामने उपस्थित है। अब क्षण भर भी सोचने-विचारने का अवकाश नहीं है। जब घर में सहसा चारों ओर प्रज्वलित आग लग जाय तो जल से बुझाने का विचार भी नहीं उठता ॥४८॥ समरे शमयन्ति वैरिवर्गानथवा जीवनमेव यापयन्ति । इह काचन चाहुवाणवंशे विदिता नैव हि पद्धतिस्तृतीया ॥४९॥ चौहाण वीर या तो युद्ध में शत्रु समुदायों को नष्ट कर देते हैं या स्वयं ही काम आ जाते हैं। इस चौहाणवंश के लिये और कोई तीसरा मार्ग नहीं है ॥४९॥ समयस्य नृशंसतां समीक्ष्य स्फुटचारित्र्यविभूषणा भवत्यः । यशसः सरणीषु वीरपत्नीव्रतचर्यासु भवन्तु सावधानाः ॥५०॥ अवरोधगणानधोमुखः सन्निति सन्दिश्य रहोगतः स राजा । विससर्ज पुरोहितं प्रणम्य प्रणयामन्त्रणयन्त्रितान्तरङ्गम् ॥५१॥ फिर राजा हम्मीरदेव ने अन्तःपुर में जाकर नीचा मुँहकरके रानियों से इस प्रकार कहा— शुद्ध चरित्र ही आप लोगों का आभूषण है, अतः आप समय की क्रूरता और प्रतिकूलता को देखकर, वीरपत्नियों की व्रतचर्याओं के लिये, जो यश (रूपी प्रासाद तक पहुँचने) की सीढ़ियाँ हैं, तैयार हो जाइये। रानियों से यह कहकर राजा ने प्रेमनिवेदन से जकड़े हुये हृदय वाले पुरो- हित को प्रणाम करके (जौहर की तैयारी के लिये) भेजा ॥५०-५१॥ वितरन् स वसूपमानविप्रप्रवरेभ्यः प्रचुराणि काञ्चनानि । प्रसभस्रुतमश्रुपूरमेव स्वकरस्थं कुरुते स्म दानतोयम् ॥५२॥ अग्नि के समान तेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को प्रचुर सुवर्ण दान देते समय हम्मीरदेव ने वेग से बहने वाले आँसुओं के प्रवाह को अपने हाथ में लेकर उसी को दान का संकल्पजल बनाया ॥५२॥ समरोत्सुकवैरिसिंहनादैरथ निर्भिन्नमनाः सनादमुच्चैः । नवनीरदगर्जितेन नुन्नः प्रतिगर्जन्निव केसरी चचाल ॥५३॥ फिर युद्ध के लिये उत्सुक शत्रुओं के सिंहनादों को सुनने से आवेश में आकर, नवीन मेघ के गंभीरगर्जन से उत्तेजित होकर ज़ोरों की गर्जना करने वाले सिंह के समान, गरजते हुये वीर हम्मीरदेव युद्ध में कूद पड़े ॥५३॥