सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् यवनाः सवनायुजास्तदानीं महिमासाहसुमीरखेब्रुमध्ये । नृपतिं प्रथमं प्रतिष्ठमानं परितस्तं परिचक्रुरक्रमन्तम् ॥५४॥ उस समय अरबी घोड़ों पर सवार यवन, हम्मीरदेव को महिमाशाह और उनके भाई श्रेष्ठ मीर खेब्रु के बीच में बिराजमान देखकर क्रम का ध्यान न रखकर पहले उन्हीं पर टूट पड़े ॥५४॥ अवतीर्णममुं च दुर्गमध्यादवधार्य प्रयतान्तरा महिष्यः । हुतहव्यसमेधिते हुताशे जुहुवामासुरवारिता वपूंषि ॥५५॥ इधर रानियों ने, हम्मीरदेव को दुर्ग से उतर कर युद्ध में गये हुये जानकर, स्थिर मन से, बे रोकटोक, हवन की गई सामग्री से प्रज्वलित यज्ञाग्नि में अपने शरीरों की आहुतियां दे दीं (जौहर किया) ॥५५॥ × × × × × × × × × × ॥५६॥ धारासारैरुद्धुराणां शराणां धूलिव्रातैर्बद्धभोमान्धकारे । विद्युत्प्रायैर्मुक्तकोशैः कृपाणैस्तत्राकाले विभ्रमः प्रावृषोऽभूत् ॥५७॥ (सेना से उड़ने वाले) धूल के बादलों से चारों ओर अन्धकार छा जाने से, वेग से चलाये गये बाणों की घनघोर वर्षा से और म्यान से निकाली गईं तलवारों की बिजली जैसी चमक से उस युद्ध में असमय में ही वर्षाऋतु का विभ्रम उपस्थित हो रहा था ॥५७॥ रेणुव्रातैर्ग्रस्तभास्वद्गभस्तौ सान्द्रीभूतध्वान्तसन्दोहभाजि । दिव्यस्त्रीणां व्योम्नि वैमानिकीनां ताराकारा रेजिरे रत्नहाराः ॥५८॥ आकाश में, जहां देदीप्यमान सूर्य भी (सेना से उत्थित) धूल-समूह से ढक गया था और जहां चारों ओर गहरा अन्धकार छा गया था, विमान में बैठी हुईं (युद्ध में हत वीरों के स्वागतार्थ आईं हुईं) स्वर्ग की अप्सराओं के रत्नहार तारों के समान चमक रहे थे ॥५८॥ आलोक्यास्यच्छत्रमिन्दुप्रकाशं दूरादेव व्यद्रवच्छत्रुसैन्यम् । गन्धेभानां दानगन्धाद् यथास्य भ्रष्टारोहा वैरिणां वारणेन्द्राः ॥५९॥ हम्मीरदेव के चन्द्रबिम्ब के समान उज्ज्वल छत्र को दूर से ही देखकर शत्रु सेना भाग गई, जैसे हम्मीर के मदोत्कट हाथियों के मद जल की गन्ध को सूंघकर वैरियों के हाथी, अपने महावतों को पटक कर, भाग गये ॥५९॥ मूर्धाकम्पैरङ्कुशग्राहकाणां शश्वत् तीव्रं वन्ध्ययन्तः प्रयत्नम् । मातङ्गास्ते विद्रवन्तः पराञ्चः स्वीयान्येव द्रागमृद्नन्बलानि ॥६०॥ महावतों के अंकुश प्रहारों के तीव्र प्रयत्न को भी अपने सिर हिलाकर विफल कर देनेवाले शत्रु के हाथी भाग खड़े हुए और शीघ्र ही उन्होंने अपनी ही सेना को रौंद दिया ॥६०॥
(५५) दुर्वारघोरचरित्रसंकटे समुपस्थिते राजस्थानेषु पतिव्रताः पतिप्राणा महिलाः सविधि वह्निं प्रज्वाल्य समर्च्य परिक्रम्य हविरादिभिर्हुत्वा अन्ते देहरूपाभिरेवाहुतिभिर्वह्निं तर्पयन्ति स्मति महाव्रतं 'जौहर' नाम्ना प्रसिद्धम् ।