भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 161

द्वादशः सर्गः १३५ संत्रस्तांस्तान् सन्निवर्त्य स्वसैन्यानुलूग्खानेनानुजेनानुयातः । अव्यग्रात्मा सम्पराये समागाद् वर्षन् भल्लांस्तूर्णमल्लावुदीनः ॥६१॥ अलाउद्दीन, जिसके पीछे उसका भाई उलूगखाँ चल रहा था, अपनी भयभीत सेना को (आश्वासन देकर) रणक्षेत्र में लौटाता हुआ और स्थिरतापूर्वक शीघ्रता से बाणों की वर्षा करता हुआ, युद्धस्थल में आया ॥६१॥ शस्त्राशस्त्रि व्यापृतानां भटानां साहङ्कारैः सङ्गतानां रणान्तः । द्रागुद्भूता रक्तधाराः क्षतोत्था नादुः खेदं स्वेदवत् संस्रवन्त्यः ॥६२॥ युद्धस्थल में आये हुये अभिमानी वीरों को, परस्पर शस्त्रप्रहार के कारण घावों से पसीने की तरह बहने वाली रक्त की धाराओं ने भी कष्ट नहीं दिया ॥६२॥ उत्क्षिप्योच्चैः प्रेरितस्तीक्ष्णखड्गो नालं भेत्तुं वैरिणो वारवाणम् । तत्संघट्टादुत्थितोऽङ्गे कृशानुर्निन्ये मूर्च्छां लम्बकूर्चावलम्बो ॥६३॥ किसी वीर ने अपनी तलवार उठाकर बड़े जोर से शत्रु पर जो प्रहार किया वह प्रहार शत्रु का कवच नहीं भेद सका, किन्तु तलवार और कवच के संघर्ष से शत्रु के वक्षःस्थल में जो आग निकल पड़ी वह शत्रु की लम्बी दाढ़ी में जा लगी और उसने शत्रु को मूर्च्छित कर दिया ॥६३॥ क्रोधान्मुक्ता धन्विभिस्तीव्रवेगैरग्रे लूनं वैरिणां वक्त्रपद्मम् । संबिभ्राणा व्योमकासारमध्ये बाणास्तिर्यग्नाललक्ष्मीमवापुः ॥६४॥ तीव्र वेग वाले धनुर्धरों ने क्रोध से जो बाण छोड़े वे शत्रुओं के मुख-कमलों को काटकर आकाश में ले उड़े और उन्होंने आकाश-सरोवर में शत्रुओं के मुख-कमलों के नीचे-टेढ़े कमल-नाल की शोभा को प्राप्त किया ॥६४॥ सङ्ग्रामान्ते पतितानां भटानां भूषारत्नज्योतिषाऽत्युज्ज्वलाभैः । अस्रापूरैर्लम्भिताः पावकाभैर्धूमच्छायामुच्छ्रिता दन्तिदेहाः ॥६५॥ युद्धक्षेत्र में काम आये हुये वीरों के रत्नाभूषणों की चमक से जिनकी आभा बढ़ गई थी ऐसे, अग्नि के समान प्रज्वलित रक्त-समूहों ने, मारे गये हाथियों के काले और उन्नत शरीरों को धुयें की शोभा प्राप्त करा दी ॥६५॥ उत्तानस्थं स्रस्तमुक्तहस्तादध्यारूढाः खेटकं बद्धकेल्यः । तत्राजस्रप्रस्रुतास्रस्रवन्तीः फेत्कारिण्यः फेरुकान्ताः प्रतेरुः ॥६६॥ खेल करने वालीं और 'फेत् फेत्' शब्द करने वालीं गीदड़ों की मादाओं ने, युद्धक्षेत्र में निरन्तर बहने वाले रक्त की नदियों को, किसी वीर के कटे हुए हाथ से गिरे हुए और सीधे खड़े हुए खेटक नामक शस्त्र पर चढ़कर (वहाँ से कूदकर) पार किया ॥६६॥ (६६) खेटकमायुधविशेषम् । 'फेत् फेत्' इति अपशब्दं कुर्वन्त्यः । फेरुकान्ताः शृगाल्यः ।